खिरसिन्धु साहू

"पता: सरायपाली, छत्तीसगढ़ पेशा: शिक्षक, सृजन की भाषाएं: हिंदी एवं संबलपुरी मुख्य लेखन विधाएं: कविता (गंभीर एवं दार्शनिक स्वर) तथा वैचारिक गद्य प्रमुख साहित्यिक कार्य: डिजिटल काव्य मंच 'काव्य कुंज' (kavyakunj.com) का संचालन। आगामी पुस्तक: 'काम की राजनीति : शिक्षा, स्वास्थ्य और सुशासन का मॉडल'।"

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जीवंत कथाकार

"कलम का सिपाही, वो उपन्यासों के सम्राट, जिनकी लेखनी में धड़कते हैं जन-जन के जज़्बात। भारत की माटी की महक, वो गाँव की चौपाल, प्रेमचंद के अक्षरों ने बुना"

शौर्य बनाम कायरता

"अक्सर खाली बर्तन ही अधिक शोर मचाते हैं, कायर ही छद्म वीरता का चोला पहनकर आते हैं। कथनी के शूरवीर, करते हैं कोरे शब्दों का व्यापार व्यर्थ के दंभ में अप"

शब्दों का दर्पण

"मंच सुसज्जित, शब्द सुवासित, गूँज रहा उपदेश महान, "वाणी में हो शील-मर्यादा," बाँट रहे थे यही ज्ञान। सुनकर उनके मीठे प्रवचन, मुग्ध हुआ था यह संसार, मानो"

सत्ता और पूँजी का गठजोड़

"तुम किस आशा में बैठे हो, नीति कभी कोई उपकार करेगी? तुम्हारी दैन्य-निशा में भी, रश्मि कोई संचार करेगी? जिसने बुनी ये राजनीति, वो सूत्रधार कोई और ही है,"

सेवा का मौन सत्य

"सेवा के दो रूप जगत में, युग-युग से पहचाने हैं, एक दिखावा कर जग जीते, एक मौन बलिदानी है। एक बताता कर्म जगत को, ढोल-नगाड़े बजवाता, अपनी छवि के स्वर्ण-मह"

बदलाव

"वो ठंडी हवा अब कम होने लगी है, दोपहर की धूप अब बढ़ने लगी है। वसंत की विदाई का वक्त आ गया, देखो, गर्मी का नया एक रंग छा गया। फूल अगर झड़ते हैं, तो फल भी"

पिता का वात्सल्य

"बेटी, तू मेरे जीवन का स्वर्णिम प्रकाश है, तेरी हँसी में ही मेरा हर सुख-विलास है। तेरी किलकारी से ही आँगन महकता है, तेरी मासूम आँखों में मेरा सारा जग स"

थोड़ा तो भगवान से डर!

"डॉक्टर की डांट से, सहम जाता है इंसान, बीपी के खौफ से, नमक का कर देता बलिदान। शुगर की रिपोर्ट ने, ऐसा पसीना छुड़ाया है, मीठे से तौबा करके, फीका निवाला "

तुच्छता की परिभाषा

"जिनके दरबार में बस "जी हुज़ूर" का तराना है, उन्हें लगता है कि उनकी मुट्ठी में सारा ज़माना है। दिन को अगर रात कह दो, तो वो भी मान लेते हैं, चाटुकारों के "

विरह वेदना

"हर गई है शाम कहीं, और याद तेरी गहराती है, जैसे बुझते दीप की लौ, फिर-फिर कर लौह दिखाती है। वो तेरा हँसना, वो रूठना, वो बात-बात पर मुस्काना, अब मन के सू"

नए दौर का सुशासन

"आइए, हम सब मिलकर इस नए दौर के 'सुशासन के मॉडल' का जश्न मनाएं! एक ऐसा मॉडल जहाँ मेहनत और ईमानदारी जैसी पुरानी, घिसी-पिटी अवधारणाओं को म्यूजियम में रख द"

अनिश्चितता का उत्सव

"हवा के हाथ में सौंपे हैं ख़त, और चाहते हैं महफूज़ रहें, हम आईनों से उम्र मांगते, चाहते हैं ना वो बेनूर रहें। जो पानी की बूंद है हाथों में, उसे हम हीरा ब"

मौन का संताप

"सक्षम अगर खामोश हो, लुटती यहाँ पर बस्तियाँ, चुपचाप बलि चढ़ रहीं हैं, सत्य की प्रत्येक हस्तियाँ। अन्याय को जो देखकर, भी होंठ अपने सी रहे, वे नागरिक तो "

जवाबदेही लापता है!

"लोकतंत्र के इस सर्कस में, 'जवाबदेही' लापता है, कुर्सी से चिपके रहने का, सबको हुनर पता है! नैतिकता की बातें अब बस, रैलियों में सजती हैं, इस्तीफे के नाम"

बिन करूणा और न्याय के राम नाम अधूरा है

"राम नाम की लूट मची है, कैसा कलयुग आया है? मन के भीतर राम नहीं, केवल बाहर नाम सजाया है। जिस माटी में करुणा बहती थी, वहाँ व्यापार बड़ा है, चंदा चोरी करन"

समझदारी का छलावा

"दुनिया के इस भरे बाज़ार में, अक्सर वही सबसे ज्यादा ठगा जाता है, जिसके माथे पर 'समझदारी' का तिलक, समाज बड़ी श्रद्धा से लगाता है। एक जुमला, एक तीर बनकर, अ"

अभाव में स्वभाव

"जो कल तक शीतल सरिता थी, वह आज सुलगती आग हुई, थी जो अंतस की सुकोमलता, झुलस कर काली राख हुई। मत दोष दो उसकी फितरत को, मत माथे पर कोई पाप लिखो, यह विवश ह"

औसत विद्यार्थी होना

"न मैं विख्यात रहा कभी, न हुआ कभी कुख्यात, मैं वो पन्ना था जिसे, पलट दिया हर हाथ। एक शोर था आगे वाली बेंचों की मेधा का, एक खौफ था पीछे वाली बेंचों की ब"

संस्कारों का सूर्यास्त

" दौड़ रहे सब अंधी दौड़, जाने किसकी चाहत में, बेच रहे हैं चैन-सुकून, झूठी एक विरासत में। बाहर-बाहर चमक बढ़ी पर, भीतर धुंध घनेरी है, जिसे हम अपना कहते हैं,"

कर्म की कसौटी

"परिणामों के पैमाने पर, जो कर्म तुले वह श्रेष्ठ नहीं, स्वार्थ की गंध छिपी, वह धर्म कभी भी ज्येष्ठ नहीं। गौतम ने जो ज्ञान दिया, उस सत्य को पहचान ज़रा, फ"

तर्क से परे: जीवन का सत्य

"रत्ती भर भी गणित नहीं है, जीवन की इस बिसात पर, रीगा का वह जादूगर, हँसता था हर आघात पर। लोग 'वज़ीर' बचाने में ही, अपनी उम्र गुज़ार गए, और वह 'प्यादों' के"

कर्म और नियति

"न भाल की रेखाओं में, न तारों की चालों में, मत ढूंढ़ नियति का मर्म कभी, किस्मत के इन जालों में। जो लिखा है वही होगा, यह सबसे बड़ा छलावा है, सच पूछो तो यह"

जिंदगी का सफर

"ज़िंदगी में ऐसा कोई, नहीं आख़िरी मुकाम , जहाँ जा कर मिल सके, हमेशा के लिए आराम । हम सोचते हैं मंज़िलें, सब मुश्किलें कर देंगी कम, पर हर जीत के बाद, शु"

स्वाभिमान की उड़ान

"जो चाहे तुम्हें झुकाना, उस पर क्रोध न करना, गिरते हुए मनोबल को, तुम शांत हो संभालना। जिसके मन में मैल भरा, जो नीचा तुम्हें दिखाता है, तरस खाओ उस राही "

जमीर की नीलामी

"चले थे बदलने जो राजनीति, खुद ही ढल गए, रंग देख उनके, गिरगिट भी शर्मसार हो गए। जो कभी 'क्रांति' का झंडा लेकर निकले थे, आज उसी पाले में जा बैठे हैं जिसे"

त्याग - सफलता का मूल्य

"सफलता कोई उपहार नहीं, यह सौगात नहीं तकदीरों की, यह पसीने की हर बूंद में ढली, कहानी है संघर्षी वीरों की। यह उन रातों का उजियारा है, जो नींद से रिश्ता त"

तुकाराम मुंडे: सिंघम

"मिलावट का दौर , बिकने लगा ज़हर बाज़ार में, हर थाली में बीमारी, और खामोशी थी दरबार में। तब प्रशासनिक गलियारे से, एक नाम गूंजकर आता है, जो पच्चीस तबादले"

युवाओं का सुनहरा भविष्य – फाइलों में सुरक्षित

"देश में इस समय सबसे सुरक्षित चीज़ अगर कोई है, तो वह है युवाओं का भविष्य—क्योंकि वह कहीं बाहर नहीं, सरकारी फाइलों और प्रेस कॉन्फ़्रेंस के शब्दों में बं"

शिक्षा के छह सोपान: 6 Cs

"ज्ञान की इस बहती धारा में, बस रटना ही आधार नहीं, सच्चा सीखना वह है, जिसमें केवल शब्दों का अंबार नहीं। चलो सजाएं जीवन को, इन छह अनमोल सितारों से, जो रा"

हे मतदाता: भाग्यविधाता

"नभ की ओर न ताको तुम, भाग्यविधाता वहाँ नहीं है, लोकतंत्र की इस धरा पर, ईश्वर का कोई काम नहीं है। तुम्हारे कल की हस्त-लकीरें , अब वो नेता लिखता है, वोट "

मूल्य

"बिन क्षुधा के स्वाद कैसा, व्यर्थ छप्पन भोग हैं, भूख की तपिश न हो तो, मिष्ठान्न भी बस रोग हैं। सूखी रोटी में छुपी जो, तृप्ति की वह बात है, भूख के ही आँ"

नई दिशा, नया सवेरा

"सुनो साथियों, सुनो रे भाई, नई दिशा अब आई है, शिक्षा की इस फुलवारी ने, नई उमंग जगाई है। छोड़ रटन की पुरानी बातें, समझ की बेला आई है, नीति नई और पाठ्यचर्"

बिकती शिक्षा, खोखला विकास

"कंक्रीट के इन जंगलों को, तुम अगर विकास कहते हो, बुझती हुई उम्मीद में, तुम रौशनी का वास कहते हो। तो सुनो! यह भ्रम तुम्हारा, आज टूटता दिखाई दे रहा है, व"

ईश्वर की माया

"निज पुत्र का वध करने रचाया था विधान होलिका ने वरदान का किया था अपमान बालक प्रह्लाद ने किया हरि का ध्यान, सत्य के आगे टिक न सका अभिमान। जो थी अग्नि से "

राख में छिपी अगन

"ऋचाओं के सुमधुर स्वरों से, फूटती थीं भोर की किरणें, तपोवन की शांत छाँव में, सुलझती थीं सभी उलझनें। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' केवल किताबी शब्द ना था, वह राष्"

चाय की मिठास ले उड़े

"सस्ता कच्चा तेल छोड़कर, महंगा खेल रचाया है, अमेरिका की घुड़की ने, यह सारा नाच नचाया है! अंकल ड्रम के डर से साहब, घुटनों पर आ बैठे, 'ग्रीन इकॉनमी' कहते"

आस्था में सेंध

"राम नाम का जाप करते, जो सत्ता के पार गए, धर्म-ध्वजा को ढाल बनाकर, जग के ठेकेदार भए। किंतु समर्पण की निधि में, नीयत इनकी डोल गई, भक्ति की आड़ छुपी जो, क"

लोकतंत्र की झांकी

"लोकतंत्र के रंगमंच पर, एकल गान का मौसम है, प्रश्न पूछना भूल गए सब, चुप रहना ही उत्तम है। रंग एक है, भेष एक है, एक ही अब तो नारा है, 'वन नेशन वन पार्टी"

नियत और दिखावा

"नियत कितनी भी उजली हो, दुनिया चेहरों से पहचान करती है, यहाँ शब्दों की ऊँची मीनारें, अक्सर चरित्र से अधिक सम्मान धरतीं हैं। कपड़ों की चमक, मुस्कानों का"

अस्तित्व

"​सृष्टि के इस विराट आलिंगन में, ना कुछ व्यर्थ है, ना कोई अनाथ। धड़कता हुआ जीव हो या प्रस्तर सा अजीव, हर कण में गूँजता, अस्तित्व का ही नाद। ​सूखे पत्तो"

इंसान होने की शर्त

"केवल साँसें चलने से ही, जीवन होता पूर्ण नहीं , जिस मन में करुणा न बसे, वह होता इंसान नहीं औरों की पीड़ा देखकर, जो थोड़ा न पिघले वह तो केवल पत्थर है, उ"

यू-टर्नासन

"पहले जिसने भरा था दम, बदलेंगे हम देश की काया, अनुलोम से खींची सत्ता, विलोम में पूरा तंत्र समाया। गर्ज रहे थे मंच-मंच पर, सिंह-नाद का रूप धरा था, काले "

समय का पहिया

"चलता रहता है निरंतर, समय का यह पहिया, न आदि इसका ज्ञात हमें, न अंत का कोई जरिया। यह अविराम, निर्बाध अपनी, धुरी पर ही घूमता, परिवर्तन का वेग क्षण में र"

कल्याण का ढिंढोरा

"वाह रे विकास! तेरा भी क्या गज़ब का पैमाना है, स्मार्ट सिटी की चमक के लिए, गरीबों को ही तो मिटाना है। कल तक जो पक्के मकान, 'योजनाओं' की शान हुआ करते थे,"

माँ: निस्वार्थ प्रेम की मूरत

"स्याही खत्म हो जाएगी, पर शब्द कम पड़ जाएंगे, माँ के त्याग के किस्से, सदियों तक सुनाए जाएंगे। वह कोई देवी नहीं, बस एक ममता की छाया है, जिसने अपनी हर सां"

ईश्वर तक का मार्ग

"यदि सचमुच कोई ईश्वर है, तो वह मंदिर की सीढ़ियाँ नहीं गिनेगा, न यह पूछेगा कितनी बार माथा झुकाया, कितनी माला फेरी, कितने घंटे आरती में बिताए। वह शायद के"

सेहत भगवान भरोसे

"बजाइए तालियां, 'खाद्य सुरक्षा' का त्यौहार है, संभलकर निगलना साहब, थाली में जहर तैयार है। विदेशों ने लौटा दिया, हमारा मसाला, फल और अन्न, कहा- "इसमें घु"

बड़ी लूट की खुली छूट

"लुटेरों को मिली शह,लूट की है खुली छूट, चारों तरफ हावी है परसेंटेज की भूख। परवाह जो करे, वो देशद्रोही कहलाए, बेपरवाह बना रहे अंधभक्त और मूर्ख। सैकड़ों-"

बिना रीढ़ के महामानव

"सुनो भाई! ये जो पर्दे के छद्म नायक हैं, या खेल जगत के बड़े-बड़े सितारे हैं। जो विज्ञापनों में बने फिरते महान हैं। इनसे किसी इंकलाब की उम्मीद मत पालना, "

सुजलाम-सुफलाम

"अखबारों में तो झांको, रामराज्य छाया है, महंगाई और बेकारी तो बस केवल माया है। हर युवा के हाथ में अब नौकरी की बहार है, चहुं ओर बस तरक्की और खुशहाली का त"

स्वार्थ का बीज

"छोटी सी एक इच्छा जब, सीमाओं को पार करती है, दबी सी कोई लालसा जब, नया लालच उभारती है। यहीं बोया जाता है वह बीज, एक बड़े विनाश का, जो कल एक विकट अन्याय "

प्रकृति का प्रतिशोध

"पत्थरों के इस नगर में, घुट रहा है अब जीवन, मनुष्य की इस प्रगति ने, नष्ट कर दिया उपवन। स्वार्थ के ऊँचे शिखर पर, हम बैठकर क्या पाएंगे? जड़ें अपनी काटकर "

खुद की मटकी सूखी है

"विश्वगुरु का चोला ओढ़े, झूठी शान दिखाई है, आटे-दाल के भाव न पूछो, कैसी आग लगाई है ! लंगर चलता सात समंदर, अपनी बस्ती भूखी है, सबको जल पिलाने वाले की, ख"

क्रांति का सूर्य: बाबासाहेब

"वो मरुस्थल में बहती एक अविरल धारा थे, वो डूबती मानवता का इकलौता किनारा थे। जहाँ सदियों से छाया था अंधकार अन्याय का, वहाँ ज्ञान की मशाल लेकर चमके वो सि"

हरेली तिहार

"आए हे हमर हरेली तिहार। हरियर-हरियर ओढ़े हे भुइयाँ, समय म निपटे हे सब खेती-खार। नांगर, कुदाली अऊ राफाला धोइन, अन्नदाता मन सब औज़ार ला संजोइन। धूप-दीप अ"

दरबारी संस्कार

"शर्म बेचकर जो अपनी, अब दरबारी हो जाते हैं, वही आज के दौर में, सबसे भारी हो जाते हैं। योग्यता रद्दी है, डिग्रियां खामोश खड़ीं, जो तलवे चाटें बेहतर, वो स"

उधार की बुद्धि

"सहूलियत के रेशमी जाल ने, बुद्धि को यूँ जकड़ा है, कि रीढ़ की अपनी दृढ़ता छोड़, हमने तार को पकड़ा है। जो मस्तिष्क कभी ब्रह्मांड की गुत्थियाँ सुलझाता था,"

सत्ता का चक्रव्यूह

"जहाँ बिकती थी शिक्षा, वहाँ स्कूल नए सजाए, मोहल्ला क्लीनिक खोल के उसने, लाखों दर्द मिटाए। बिजली-पानी सुलभ किया, दी महिलाओं को राह, इस जन-कल्याण मॉडल से"

लोकतंत्र की अर्थी

"सड़कों पर सन्नाटा पसरा, संसद में शोर बहुत है, नेता बैठे राज सिंहासन, जनता मजबूर बहुत है। कल तक जो कंधे पर थे, आज गले की फांस बने, वादों के पुल टूट चुक"

बरसा दिन आसीछे

"बरसा दिन आसिछे, पायन झर-झर बरसूछे, धरती मां हंसूछे, सागुआ-सागुआ दिखुछे। सबु आड़े सागुआ-सागुआ दिखुछे। छुआमाने खेलुछन, छप-छप करी नाचुछन, किहे भी नेइं सु"

ऋतु-परिवर्तन

"जो खिला है पल्लव पर, उसे एक दिन झड़ना होगा, वसंत की सुकुमारता को, प्रखर ताप में जलना होगा। जिसे हम अंत समझते हैं, वह मात्र एक रूपांतरण है, झड़ते हुए प"

चरित्र की सुगंध

"कितने ही चेहरे आए और आँखों से उतर गए, रंग-रूप के वो सारे जलवे, लम्हों में बिखर गए। दिल की गहराइयों में मुकम्मल जगह सिर्फ उन्हें मिली, जिनके उजले किरदा"

चंदा, धंधा और सिस्टम का फंदा

"सिस्टम को ही राखी बाँधी, खूब निभाया 'रक्षा-बंधन', आज व्यवस्था के मंचों पर, बस ऐसों का होता अभिनंदन! 'चंदे' का यह अजब धंधा है, 'बॉन्ड' में सब कुछ छिप ज"

सत्ता का दंभ और करुणा का वसंत

"शहीदों के स्वप्न का, वो आज़ाद सवेरा कहाँ गया? रक्षक के वेश में भक्षक, यह कैसा अँधेरा आ गया? लोकतंत्र की पावन वेदी पर, सत्ता का यह कैसा दंभ है, देश की र"

चौपट राजा

"जब कोई चौपट राजा होता है, ढोल की जगह ढोंग बजता, अन्याय सोने की सीढ़ी चढ़ता, न्याय हर मोड़ ठोकरें खाता दरबारों में आडम्बर गूंजता, सच का स्वर कंठ में का"

वसंत ऋतुराज क्यों?

"पूछते हैं लोग अक्सर, क्यों बसंत ही ऋतुराज है? क्यों इसी के भाल सजता, श्रेष्ठता का ताज है? ग्रीष्म का संताप न इसमें, शीत का न दंश है, अतिवृष्टि न वर्षा"

जीवन का सत्य: एक खोज

"क्या है तलाश इस प्राण की, क्या है हृदय की प्यास? केवल जगत का वैभव नहीं, है पूर्णता की आस। तर्कों के कोलाहल से परे, जब ठहरता है ये जीवन, तब झाँकता है स"

पथ का निर्णय

"इस पथ चलूँ या उस पथ चलूँ, संशय में हूँ—किस पथ चलूँ। मन है विचलित, बुद्धि भ्रमित, हर मोड़ प्रश्नों से लड़ूं। सत्पथ कठिन सही पर, देता जीवन सार। संघर्षों"

जिंदगी सब सिखा देती है

"किताबों के पन्नों में कहाँ दर्ज था सलीका जीने का, ये तो वक्त ही है, जो चेहरा चमकाना सिखा देती है। कभी तपती धूप, तो कभी सर्द रातों का साया, बेरहम धूप ह"

धर्म के मुखौटे के पीछे चार्वाक

"स्वयं चार्वाक सा कर्म करते, औरों को वेदों की दुहाई देते हैं, भोग में डूबे, धर्म का स्वांग रचाते हैं। जुबाँ पे गीता, हाथ में ग्रंथ, पर मन में लोभ और स्"

हार से सीख

"पथ में गिरना हार नहीं, गिरकर रुक जाना हार है, यह तो बस मंज़िल की, एक छोटी सी दीवार है। हारता है हर मुसाफ़िर, कभी न कभी इस राह में, जीतता वही है, जो आग र"

मुश्किल सही, नामुमकिन तो न होगा।

"थक कर न बैठ ऐ मुसाफिर, अभी राहें बाकी हैं, हौसलों की तरकश में, अभी कुछ आहें बाकी हैं। माना कि अंधेरा घना है, और कांटों भरा रास्ता, पर तेरे जुनून से ही"

मुखौटों का बोझ

"तुमने जो पहने हैं चेहरे, ये कहाँ के हैं? सब उधार के हैं, दूसरों की पसंद के हैं। एक चेहरा पहनकर दफ्तर जाते हो, दूसरा पहनकर अपनों में मुस्कुराते हो, तीस"

शिक्षा का मायाजाल

"महंगी हुई है मणिक-सी विद्या, डिग्री कौड़ी मोल है, ज्ञान के इस क्रय-विक्रय में, हर तरफ बस झोल है। खून-पसीने की कमाई, झोंक दी जिस आग में, कागज़ों का ढेर ह"

महानायक का तिलिस्म

"कहा गया था वो त्यागी है, मोह-माया छोड़ कर आया है, किसी ने कहा था, चुपके से वो माँ के गहने चुरा लाया है। 'वैराग्य' नाम दिया उस पलायन को, गजब है यह जादूग"

जूतों का समाजशास्त्र

"सफलता के राजमार्ग पर मुख्य रूप से दो ही तरह के मुसाफिर सफर कर रहे हैं। एक वे, जिनके जूतों के तलवे घिसे हुए हैं, और दूसरे वे, जिनकी जीभ पर दूसरों के जू"

सोच के नए रंग

"दुनिया इतनी सीधी या इतनी बँटी हुई भी नहीं, हर बात बस 'हाँ' या 'ना' में सिमटी हुई नहीं। काले और सफ़ेद के बीच अनगिनत रंग बसे हैं, जो ठहरकर देखते जग को, "

पतन की राह

"ईश्वर का त्याग कर जो ऐश्वर्य का मोह करते, सुनिश्चित पतन की राह पर ही वे चलते हैं। धन की झिलमिल में जो सत्य को भूल जाते, क्षणभंगुर सुखों में जीवन गंवात"

विजय और यथार्थ

"खेल में तो विश्व-विजेता, सत्य लेकिन देखिए, जीवन के इस क्षेत्र में, अपनी विवशता तौलिए। वे सुशासन के शिखर पर, हम व्यवस्था से हैं त्रस्त, वे यथार्थ में ज"

नवल विहान

"कालचक्र ने बदली करवट, समय ने पन्ना पलटा है, देखो क्षितिज पर नवल सूर्य का, स्वर्ण रथ आ पहुंचा है। बीती यादें, बीती बातें, सब धुंधला इतिहास हुआ, जो शेष "

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