रचना की खोज जारी है...
विधा
तारीख
लोकतंत्र की झांकी
रचनाकार की आवाज में:
लोकतंत्र के रंगमंच पर, एकल गान का मौसम है,
प्रश्न पूछना भूल गए सब, चुप रहना ही उत्तम है।
रंग एक है, भेष एक है, एक ही अब तो नारा है,
'वन नेशन वन पार्टी' का, गूंज रहा जयकारा है।
विपक्ष के जो सूरमा थे, अब जेलों में आबाद हुए,
या सत्ता के पाले में, जाकर के रातों-रात आजाद हुए।
छापों की बरसात डराए, तो सारे दाग धुला बैठे,
स्वचालित 'वाशिंग मशीन' में, जमीर अपना भुला बैठे।
संसद की दीवारों से अब, कोई गूँज नहीं टकराती है,
बहुमत की बुलडोजर ही, हर नियम कुचलती जाती है।
चारण बनकर चौथा खंभा, बस राजा के गुण गाता है,
जो भी सवाल उठाने आए, 'देशद्रोही' बताया जाता है।
काम की राजनीति मौन है, शिक्षा-स्वास्थ्य नीलाम हुए,
सुशासन के मॉडल सारे, बस कागज़ पर गुमनाम हुए।
निरंकुशता के इस रथ का, पहिया सरपट दौड़ रहा है,
बाँध के पट्टी आँखों पर, हर कोई मुँह को मोड़ रहा है।
स्वस्थ बहुत है लोकतंत्र यह, बस सांसें चलना ही बाकी है,
राजा की जयकार करो बस, अब यही एक ही झाँकी है।
कलमकार