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अनिश्चितता का उत्सव
रचनाकार की आवाज में:
हवा के हाथ में सौंपे हैं ख़त, और चाहते हैं महफूज़ रहें,
हम आईनों से उम्र मांगते, चाहते हैं ना वो बेनूर रहें।
जो पानी की बूंद है हाथों में, उसे हम हीरा बनाना चाहते हैं,
अजीब मोड़ है ये समझ का, हम हर अनिश्चित को भुनाना चाहते हैं।
जो कल हाथ से छूट जाना है, क्यों उसी पर हक जताते हैं?
ना काया अपनी, ना माया अपनी, ना वक्त का कोई भरोसा है।
ये जीवन बस इक सराय है, जहाँ साँसों का सिर्फ़ बसेरा है,
पर इंसान यहाँ ऐसा सोचे, जैसे सदियों का यहाँ डेरा है।
सुबह जो धूप खिड़की पर थी, वो शाम ढले धुंधला जाती है,
जो बाज़ी आज अपनी थी, वो कल किसी और की हो जाती है।
परिस्थितियों के इस झूले पर, हम ठहराव ढूंढने निकले हैं,
हम मिट्टी के बने पुतले हैं, पर लोहे का रोब दिखाने निकले हैं।
तो छोड़ो ये झूठी फिक्र सारी, इस बहते दरिया में उतर कर देखो,
सुरक्षा के इस तंग पिंजरे से, ज़रा आज़ाद होकर देखो।
मज़ा तो इस जीवन के खेल का तब है, जब हर अगला कदम एक राज़ हो,
जहाँ कुछ भी निश्चित ना हो जग में, बस उसी पल पर हमें नाज़ हो।
कलमकार