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काव्य कुंज

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विधा तारीख

तर्क से परे: जीवन का सत्य

रत्ती भर भी गणित नहीं है, जीवन की इस बिसात पर, रीगा का वह जादूगर, हँसता था हर आघात पर। लोग 'वज़ीर' बचाने में ही, अपनी उम्र गुज़ार गए, और वह 'प्यादों' के दम पर, बाज़ी सारी मार गए। सुरक्षा के आवरण में छुपना, कायरता का काम है, खतरों से मुकाबला ही , असल जीवन का नाम है। सबसे कीमती मोहरे को भी, हँसकर जो कुर्बान करे, कालचक्र भी ठिठक कर, उस साहस का सम्मान करे। तर्क और दलीलों का, जहाँ दम निकलने लगता है, वहीं से एक पागलपन का, नया रास्ता बनता है। जब सब कहें कि 'हार तय है', राहें सारी वीरान हों, तब अपने 'सहज ज्ञान' पर, खुद से ज़्यादा मान हो। कभी गिरना, कभी कटना, कभी सब कुछ लुटाना, मगर राख के ढेर से भी, फिर जीत की लौ जलाना । मोहरों का मोह क्या करना, जब वक़्त ही हाथ से जाए, रणभूमि का सिकंदर तो वह , जो अंतिम वार कर पाए। यह ज़िंदगी चौंसठ खानों का, कोई नपा-तुला खेल नहीं, यहाँ भावनाओं और भाग्य का, होता कोई मेल नहीं। तो चलो आज कुछ मोहरे, हम भी दांव पर लगाते हैं, सुरक्षित किनारों को छोड़, तूफ़ान में घर बनाते हैं। अंत में बिसात सिमट जाएगी, खेल खत्म हो जाएगा, पर वो 'एक साहसी चाल', सदियों तक याद आएगा।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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