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काव्य कुंज

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विधा तारीख

जीवन का सत्य: एक खोज

क्या है तलाश इस प्राण की, क्या है हृदय की प्यास? केवल जगत का वैभव नहीं, है पूर्णता की आस। तर्कों के कोलाहल से परे, जब ठहरता है ये जीवन, तब झाँकता है सत्य वह, जिसे ढूँढता है मन-भुवन। है प्रथम चाह उस शून्यता की, निज अंतस का वो कोना, जहाँ हो बस आत्म-दर्शन, न पाना हो न खोना। मैं कौन हूँ? यह जान लूँ, बस बुद्ध सा एक बोध हो, स्वयं से ही स्वयं का, एक मौन सा बस शोध हो। एक नेह हो निश्छल जहाँ, न मुखौटों का आवरण, स्वीकार हो हर रूप में, बिना किसी भी कारण। यूँ ही नहीं ली श्वास मैंने, कर्म का कुछ अर्थ हो, मेरी छुअन से विश्व का, कोई भी कण न व्यर्थ हो। तन हो निरोगी, मन रहे हर बेड़ियों से मुक्त , ज्ञान की बहती नदी में, मैं रहूँ सदैव संयुक्त। और जब विदा की बेला आए, तो जग में रहे यह भान, मेरे सुकर्मों में बसें, सदियों तलक मेरे प्राण। यह देह तो बस पात्र है, कामनाएँ अपार हैं, इन लालसाओं के पार ही, जीवन का पूर्ण सार है।

कलमकार

खिरसिंधु साहू

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