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काव्य कुंज

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विधा तारीख

हरेली तिहार

आए हे हमर हरेली तिहार। हरियर-हरियर ओढ़े हे भुइयाँ, समय म निपटे हे सब खेती-खार। नांगर, कुदाली अऊ राफाला धोइन, अन्नदाता मन सब औज़ार ला संजोइन। धूप-दीप अऊ गुलाल लगाइन, माई-देवता ला नवात चढ़ाइन। दुआर-दुआर म नीम के पाना, सबो बिपत्ति अऊ रोग ला भगाना। गौ-माता ला लोई खवावयं, घर-घर म सुख अऊ समृद्धि लावयं। लइका मन गेड़ी म चढ़के धावय, गली-खुचरी म उछाह छवावय। ठेठरी, खुरमी अऊ चीला के गोठ, हाँसी-खुशी म खिलगे सबो के होंठ। मेहनत फले हे, हँसत हे किसान, छत्तीसगढ़ के ऐहा हर ए स्वाभिमान। नाचयं, गावयं, मनावयं तिहार, जुड़े रहे अइसने मया अऊ दुलार!

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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