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काव्य कुंज

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विधा तारीख

बिना रीढ़ के महामानव

सुनो भाई! ये जो पर्दे के छद्म नायक हैं, या खेल जगत के बड़े-बड़े सितारे हैं। जो विज्ञापनों में बने फिरते महान हैं। इनसे किसी इंकलाब की उम्मीद मत पालना, इन्होंने तो हुकूमत के आगे, अपना ईमान गिरवी रख दिया है। सड़क पर युवा सीना ताने खड़े हैं, कॉकरोचों का दल न्याय के लिए अड़े हैं । पर हुकूमत की बेशर्मी का आलम तो देखो, एक आदमी का इस्तीफा नहीं लिया जा रहा, सरकार उसे ऐसे सीने से चिपकाए बैठी है, जैसे वो कोई खजाना हो, या लोकतंत्र का आखिरी पायजामा हो ! अरे, तुम इन 'सक्षम' हस्तियों से क्या उम्मीद करते हो? ये तो वो पालतू दरबारी हैं, जो मालिक के इशारों पर, बस दुम हिलाने का अभ्यास करते हैं। लुटेरे तो भाई, अपना काम पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं, वो सत्ता में बैठे हैं, मुल्क नोच रहे हैं, तिजोरियां भर रहे हैं। धोखा तो इन खामोश सूरमाओं' ने दिया है, जिन्होंने समाज को जगाने के बजाय, लुटेरों को अपनी खामोशी की चाबी सौंप दी है। "हमारा क्या!" कहकर जो सुविधा की रज़ाई में घुसे हैं, और सोच रहे हैं कि ये आग उनके घर तक नहीं आएगी? तो वे इस मुगालते में रहें! जब वक्त का ये अंधा चक्का घूमेगा, तो ये 'सितारे' आसमान में नहीं, इतिहास के कूड़ेदान में मुँह के बल गिरे मिलेंगे। लुटेरों से ज्यादा मुझे इन खामोश 'महानुभावों' पर हँसी आती है, जिन्हें लगता है कि बिना रीढ़ के भी, सीना ताना जा सकता है!

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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