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काव्य कुंज

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विधा तारीख

शौर्य बनाम कायरता

अक्सर खाली बर्तन ही अधिक शोर मचाते हैं, कायर ही छद्म वीरता का चोला पहनकर आते हैं। कथनी के शूरवीर, करते हैं कोरे शब्दों का व्यापार व्यर्थ के दंभ में अपना सीना चौड़ा दिखाते हैं। सच्चे वीर तो अथाह समंदर से शांत रहते हैं, बिना किसी प्रलाप के हर एक ज्वार सहते हैं। बस कर्म की वेदी पर अपना निज शीश झुका, वे चुपचाप ही अपनी शक्ति को संजोते हैं । उनकी चुप्पी को जो कायरता समझ लेते हैं, वे क्या जानें गहराई में कैसे तूफ़ान पलते हैं। पर जब भी वक़्त की कड़ी कसौटी आती है, विपदाओं की काली आंधी जब मंडराती है। तब सदैव छद्म वीरों की कलई खुल जाती है, पीठ दिखाकर भागने में ही भलाई नज़र आती है। मंच के वे झूठे नायक, जब हकीकत से टकराते हैं, जान बचाने को सुरक्षित दीवारें ढूँढने लग जाते हैं। और ठीक उसी पल, जब सब साथ छोड़ जाते हैं, वे शांत बैठे वीर, मौन तज रण में आते हैं। बिना किसी शोर के, बिना कोई ताल ठोके, अकेले ही वे हर भयंकर तूफ़ान को हैं रोकते। जहाँ छद्म वीर कांपते हैं मौत के साये से, वहाँ सच्चे वीर खेलते हैं प्राणों की दांव पे। वीरता कभी भी प्रदर्शन की मोहताज नहीं होती, यह तो रगों में सुलगने वाली ज्वाला है। कायरों का शोर तो महज़ पानी का बुलबुला है, सच्ची वीरता ने ही हमेशा इस जगत को संभाला है। दिखावा करने वाले अक्सर विपदा में खो जाते हैं, और खामोश रहने वाले ही सदा इतिहास बनाते हैं।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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