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काव्य कुंज

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विधा तारीख

थोड़ा तो भगवान से डर!

डॉक्टर की डांट से, सहम जाता है इंसान, बीपी के खौफ से, नमक का कर देता बलिदान। शुगर की रिपोर्ट ने, ऐसा पसीना छुड़ाया है, मीठे से तौबा करके, फीका निवाला चबाता है। कैलोरी गिन-गिन कर खाने का, छाया खुमार है, पर 'दूसरों का हक़' खाने, इंसान हर दम तैयार है! रिश्वत की मलाई में, न बढ़ता कोलेस्ट्रॉल है, गरीब की कमाई निगलने से, होता न हार्ट फेल है! दवाइयों का टाइम-टेबल, जुबां पर रटा हुआ है, पर कर्मों का कांटा देखो, बेईमानी पर अटका हुआ है। लगता है इन्हें भगवान का, सर्वर अभी डाउन है, इसलिए तो पाखंडियों के सिर, सजा हुआ क्राउन है। छीनी हुई दौलत से, जब मंदिर में चढ़ाते चंदा हैं, सोचते हैं ऊपर वाले का भी, शायद ऐसा ही धंधा है! अरे नादाँ! शरीर के रोगों का, तूने खोज लिया इलाज, पर बीमार पड़ी आत्मा की, ना रख पाया तू लाज। मेडिकल की रिपोर्ट में चाहे, तू सौ प्रतिशत फिट आए, पर ईश्वर की पैथोलॉजी लैब से, तू कैसे बच कर जाए? नमक-चीनी छोड़ दी, तो अब एक काम और कर, दूसरों का हक़ मत छीन, थोड़ा तो भगवान से डर!

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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