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लोकतंत्र की अर्थी
रचनाकार की आवाज में:
सड़कों पर सन्नाटा पसरा, संसद में शोर बहुत है,
नेता बैठे राज सिंहासन, जनता मजबूर बहुत है।
कल तक जो कंधे पर थे, आज गले की फांस बने,
वादों के पुल टूट चुके हैं, सपने सारे राख बने।
कानून कागजों की बंदी है, न्याय अभी मौन है,
सत्ता के गलियारों में बस, झूठ का ही रौब है।
मंचों पर जो बोल रहे थे, अब चुप्पी की मूरत हैं,
लोकतंत्र की लाश लिए, सब अपनी-अपनी मद में हैं।
आज़ादी की जमीं सिसकती, सच्चाई पर ताले हैं,
राजा के दरबार में देखो, बिके हुए रखवाले हैं।
पर फिर भी आशा बची कहीं, कोई दीपक जलता है,
अंधियारे से लड़ने वाला, हर युग में पलता है ।
हर युग में पलता है......
कलमकार