रचना की खोज जारी है...
विधा
तारीख
अभाव में स्वभाव
रचनाकार की आवाज में:
जो कल तक शीतल सरिता थी,
वह आज सुलगती आग हुई,
थी जो अंतस की सुकोमलता,
झुलस कर काली राख हुई।
मत दोष दो उसकी फितरत को,
मत माथे पर कोई पाप लिखो,
यह विवश हुआ है भीतर से,
तुम इस माथे पर 'अभाव' लिखो।
जब जठराग्नि विकराल बने,
तब बोध-विवेक सब सोते हैं,
मजबूरी की इस चौखट पर,
आदर्श तड़पकर रोते हैं।
जो हाथ प्रार्थना में उठते,
वह छीनने को मजबूर हुए,
इक क्षुधा-तृप्ति की खातिर देखो,
कैसे स्वभाव चकनाचूर हुए।
यह अकाल केवल रोटी का नहीं,
यह स्नेह-शरण का भी तो है,
जब मन को आदर मिल न सका,
तब जनम हुआ प्रतिशोध का है।
असुरक्षा की कड़वी छाया,
संतोष का अमृत पीती है,
फिर लालच का साम्राज्य बढ़े,
और सहज भावना मरती है।
सच्चाई का जो संबल था,
वह तंगहाली में बिक जाता,
जब स्वाभिमान को रोज़ यहाँ,
चौराहों पर तौला जाता।
इंसान नहीं होता दानव,
हालात बदल देते काया,
ये रीते बर्तन ही अक्सर,
डस लेती जिनकी है छाया।
हाँ, कुछ विरले ऐसे भी हैं,
जो तपकर कुंदन बनते हैं,
जो सहकर जग की कड़वाहट,
औरों के आंसू चुनते हैं।
अतः तनिक गंभीर बनो,
इस मूल सत्य को पहचानो,
स्वभाव अगर अक्षुण्ण रखना,
तो अभाव मिटाना धर्म मानो।
जब तृप्त रहेगी हर आत्मा,
तभी इंसानियत मुस्काएगी,
फिर कोई भूखी लाचारी,
मर्यादा लाँघ न पाएगी।
कलमकार