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धर्म के मुखौटे के पीछे चार्वाक
रचनाकार की आवाज में:
स्वयं चार्वाक सा कर्म करते,
औरों को वेदों की दुहाई देते हैं,
भोग में डूबे, धर्म का स्वांग रचाते हैं।
जुबाँ पे गीता, हाथ में ग्रंथ,
पर मन में लोभ और स्वार्थ प्रचंड,
त्याग और तप सब किताबों तक सीमित हैं।
ऋण लेकर घृत पीना है प्रिय,
सत्य और संयम लगे हैं अप्रिय,
चार्वाक के पथ पर चलकर भी,
खुद को कहते “सनातनी”।
धर्म का दीपक बुझा दिया,
पाखंड का जाल बुन लिया,
ऋषियों की विरासत बेचकर,
अहंकार का गहना पहन लिया।
ना चार्वाक दोषी, ना सनातन कलुषित,
दोषी है वह मन जो छल में हैं लिप्त,
कर्म और वचन जब होंगे एक
तभी होगा सत्य का सूर्य तेज।
कलमकार