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जूतों का समाजशास्त्र
रचनाकार की आवाज में:
सफलता के राजमार्ग पर मुख्य रूप से दो ही तरह के मुसाफिर सफर कर रहे हैं। एक वे, जिनके जूतों के तलवे घिसे हुए हैं, और दूसरे वे, जिनकी जीभ पर दूसरों के जूतों की पॉलिश लगी है। सफलता के बाजार में भले ही दोनों का कद बाहर से एक जैसा लगे, लेकिन यथार्थ यही है कि 'जूते घिसकर' बनाई गई पहचान और 'जूते चाटकर' बनाई गई पहचान में वही बुनियादी फर्क है, जो एक जंगल के शेर और सर्कस के कुत्ते में होता है।
आइए, इस 'जूता-पुराण' और इसके मनोवैज्ञानिक पहलुओं का थोड़ा विस्तार से आनंद लें:
1. जूते घिसने वाले: सख्त रीढ़ के जिद्दी मालिक
यह समाज की वह प्रजाति है जिसे 'मेहनतकश' या 'आदर्शवादी' कहा जाता है। इनके जूतों के तलवों में सुराख हो जाते हैं, एड़ियों में दरारें आ जाती हैं और दफ्तरों या सड़कों की खाक छानते-छानते इनके महंगे जूते भी अंततः 'हवाई चप्पल' जैसी शक्ल इख्तियार कर लेते हैं।
इनकी कार्यप्रणाली: ये अपनी पहचान अपनी काबिलियत के हथौड़े और पसीने की स्याही से गढ़ते हैं।
इनकी समस्या: इस प्रक्रिया में समय बहुत लगता है। कई बार तो जब तक समाज में इनकी 'पहचान' बनती है, तब तक इनके घुटने जवाब दे चुके होते हैं।
इनकी सबसे बड़ी पूंजी: जब ये रात को आईने के सामने खड़े होते हैं, तो उन्हें खुद से आँखें मिलाने के लिए कोई 'फिल्टर' नहीं लगाना पड़ता। इनकी नींद को किसी बॉस की नाराजगी का डर नहीं सताता।
2. जूते चाटने वाले: लचीली रीढ़ के विशेषज्ञ
ये आधुनिक सफलता के 'शॉर्टकट' ब्रांड एंबेसडर हैं। डार्विन का विकासवाद भी इन्हें देखकर हैरान रह जाता है क्योंकि इन्होंने बिना पैरों के इस्तेमाल के मीलों का सफर तय करने की कला विकसित कर ली है। इनके खुद के जूते हमेशा चमचमाते रहते हैं, क्योंकि इनकी तरक्की दूसरों के जूतों की सफाई पर निर्भर करती है।
इनकी कार्यप्रणाली: इनकी रीढ़ की हड्डी में ऐसा अद्भुत और जन्मजात लचीलापन होता है कि ये बिना किसी योगाभ्यास के भी सत्ता या बॉस के सामने 90 से 180 डिग्री तक आसानी से झुक सकते हैं।
इनके हथियार: इनके तरकश में 'जी सर', 'बिल्कुल सर', 'वाह सर क्या बात कही है', और 'आपसे बेहतर कौन जानता है सर' जैसे अचूक बाण होते हैं।
इनकी वफादारी: इनकी वफादारी व्यक्ति से नहीं, बल्कि कुर्सी से होती है। जिस दिन कुर्सी पर बैठा व्यक्ति बदलता है, उस दिन इनकी जीभ बिना जीपीएस के नए जूतों का पता ढूंढ लेती है।
फर्क जो साफ नजर आता है
"जूते घिसकर शिखर पर पहुँचने वाले व्यक्ति को रास्ते के हर पत्थर की पहचान होती है, जबकि जूते चाटकर पहुँचने वाले को सिर्फ ब्रांडेड पॉलिश के स्वाद का पता होता है।"
जब जूते घिसकर ऊपर पहुँचने वाला व्यक्ति किसी ऊंचे पद पर बैठता है, तो वह जमीन से जुड़ा रहता है। वह संघर्ष की कीमत जानता है और दूसरों के टैलेंट की कद्र करता है।
इसके ठीक विपरीत, जूते चाटकर ऊपर पहुँचने वाला व्यक्ति कुर्सी पर बैठते ही सबसे पहले अपने जूते आगे कर देता है, ताकि कोई नया 'होनहार' आकर अपना काम शुरू कर सके। उसे हमेशा इस बात का डर सताता है कि कोई और उससे ज्यादा मीठी जीभ वाला आकर उसकी जगह न ले ले। इसलिए वह अपने नीचे वालों को कभी पनपने नहीं देता।
अंततः बात सिर्फ इतनी है कि चापलूसी की सीढ़ी आपको किसी वातानुकूलित केबिन में तो बहुत जल्दी पहुँचा सकती है, लेकिन इतिहास के पन्नों में नहीं। वक्त बड़ा क्रूर समीक्षक होता है। जब वक्त की बारिश होती है, तो जीभ से की गई जूतों की झूठी पॉलिश धुल जाती है और इंसान का असली खोखलापन सामने आ जाता है। वहीं, जूतों के घिसे हुए तलवे भले ही देखने में बदसूरत लगें, पर वे हमेशा इस बात की गवाही देते हैं कि इंसान अपने पैरों पर खड़ा होकर, अपना बोझ खुद उठाकर यहाँ तक पहुँचा है।
कलमकार