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काव्य कुंज

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विधा तारीख

सेवा का मौन सत्य

सेवा के दो रूप जगत में, युग-युग से पहचाने हैं, एक दिखावा कर जग जीते, एक मौन बलिदानी है। एक बताता कर्म जगत को, ढोल-नगाड़े बजवाता, अपनी छवि के स्वर्ण-महल में, खुद ही दीप जलाता। माला, मंच, प्रशंसा पाकर, अपना मान बढ़ाया है, नाम बड़े अक्षर में लिखकर, यश का शंख बजाया है। पर जो चुपचाप चला करता, पीड़ा हरता राहों में, उसका जीवन-दीप समर्पित, अंधियारे की बाहों में। ना सम्मान की चाह, ना यश की कोई अभिलाषा है, उसके हर निष्काम कर्म में, बस सेवा की भाषा है। भीड़ सदा उस ओर बढ़े जो, ऊँचा स्वर अपनाता है, मौन तपस्वी किन्तु सदा ही, अकेला रह जाता है। कैसी यह विडम्बना देखो, मूल्य हुआ आडंबर का, सत्य दबा कोनों में सिमटा, शोर बढ़ा है बाहर का। जो जितना ऊँचा बोल रहा, वही यहाँ सम्मानित है, मौन रहकर कर्म करे जो, अक्सर वही अपमानित है। किन्तु समय की न्याय-तुला पर, सत्य सदा ही भारी है, झूठे यश की क्षणिक चमक तो, पल भर की तैयारी है। जो न बोले, पर कर दिखलाए, वही अमर हो जाता है, उसके त्याग और तपस्या को, युग-युग गाया जाता है।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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