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अस्तित्व
रचनाकार की आवाज में:
सृष्टि के इस विराट आलिंगन में,
ना कुछ व्यर्थ है, ना कोई अनाथ।
धड़कता हुआ जीव हो या प्रस्तर सा अजीव,
हर कण में गूँजता, अस्तित्व का ही नाद।
सूखे पत्तों का मौन गिरना भी, एक गहरा संवाद है,
नदियों का सूखना भी, प्रकृति का एक अनुवाद है।
परस्पर गुंथे हैं हम सब, एक अदृश्य सी डोर से,
जैस बंधा हो भोर का प्रकाश, रात्रि के तम-छोर से।
किंतु मनुष्य की दृष्टि, मात्र उपयोगिता की दास है,
अहंकार और स्वार्थ का, यह कैसा अंधा पाश है!
जो उसके काम न आए, उसे वह तुच्छ मान लेता,
अपनी सीमित चेतना को ही, वह पूर्णता समझता।
इस गूढ़ मर्म को जानने, चाहिए भीतर का ठहराव,
प्रज्ञा की निर्मल दृष्टि और करुणा का गहरा भाव।
जब मिटता है 'मैं' का भ्रम, तब खुलते हैं वे द्वार,
कि एक धूल के कण में भी, बसा है पूरा संसार।
कलमकार