रचना की खोज जारी है...
विधा
तारीख
ऋतु-परिवर्तन
रचनाकार की आवाज में:
जो खिला है पल्लव पर, उसे एक दिन झड़ना होगा,
वसंत की सुकुमारता को, प्रखर ताप में जलना होगा।
जिसे हम अंत समझते हैं, वह मात्र एक रूपांतरण है,
झड़ते हुए पत्तों के मौन में, नव-सृजन का आमंत्रण है।
पुष्पों का मोह छूटा, अब फलों की परिपक्वता शेष है,
शीतलता जो विदा हुआ, ये सूर्य का तेजस्वी संदेश है।
तर्क कहता है धूप दहन है, सत्य इसे तपस्या कहता है,
तपे बिना क्या स्वर्ण कभी, उस दिव्य आभा को पाता है?
वसंत का जाना सिखाता, अतीत के मोह का परित्याग,
ग्रीष्म की आहट जगाती, भीतर का सुप्त अनुराग।
संसार जिसे 'गर्मी' की बाधा मानकर विचलित होता है,
ज्ञानी उसी 'तप' में, स्वयं के अहंकार को खोता है।
समय की इस देहली पर, न शोक है, न कोई व्याकुलता,
यह तो प्रकृति का शाश्वत नियम है, जीवन की सुलभता।
खिड़की से आती लू की लहर, एक नया पाठ पढ़ाएगी,
कि 'तर्क' जहाँ रुके, वहीं से 'सत्य' की यात्रा शुरू हो जाएगी।
कलमकार