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काव्य कुंज

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विधा तारीख

बड़ी लूट की खुली छूट

लुटेरों को मिली शह,लूट की है खुली छूट, चारों तरफ हावी है परसेंटेज की भूख। परवाह जो करे, वो देशद्रोही कहलाए, बेपरवाह बना रहे अंधभक्त और मूर्ख। सैकड़ों- करोड़ की सड़क बननी थी यहां, पर चालीस फीसदी तो कमीशन की भेंट है। काम से पहले ही बंटवारे की शर्त है, ठेकेदार भी हैरान है- "साहब, ये कैसा रेट है?" मुनाफे के गणित में उलझा है सिस्टम, इसलिए काम लेने से हर कोई कतरा रहा। बजट और बढ़ाने की बेशर्म मांगें पूरी भी होती हैं! आम आदमी का पैसा, चंद जेबों में जा रहा। सड़कें बस फाइलों में चमक रही हैं, धरातल पर तो सिर्फ गड्ढों का अंबार है। यह कोई भूल या चूक नहीं है अब, यह तो सरेआम, दिनदहाड़े लुटता दरबार है। यह खुली लूट है जनता की आंखों के सामने, फिर भी हर तरफ एक सन्नाटा-सा छाया है। कोई डर से चुप है, कोई स्वार्थ में है अंधा, व्यवस्था ने कैसा यह जाल बिछाया है? सिर्फ सड़कों का ही यह हाल नहीं है, हर सरकारी ईंट पर इनका ही साया है। शिक्षा हो या स्वास्थ्य, सब बिगड़ा है यहां, सुशासन के नाम पर भ्रष्टाचार बढ़ाया है। जो सच बोलने की हिम्मत जुटा ले कभी, उसे फाइलों के बोझ तले दबा दिया जाता है। और आंख मूंद कर जो जय-जयकार करे, उसे सबसे वफादार बता दिया जाता है। पर समय का पहिया जब भी करवट लेगा, इन खोखली बुनियादों को ढहना ही होगा। लानी है हमें सही मायनों में काम की राजनीति, तो खामोशी को तोड़कर, सच कहना ही होगा।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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