रचना की खोज जारी है...
विधा
तारीख
इंसान होने की शर्त
रचनाकार की आवाज में:
केवल साँसें चलने से ही, जीवन होता पूर्ण नहीं ,
जिस मन में करुणा न बसे, वह होता इंसान नहीं
औरों की पीड़ा देखकर, जो थोड़ा न पिघले
वह तो केवल पत्थर है, उसमें कोई प्राण नहीं ।
सुख के ऊँचे शिखरों पर, अभिमान नहीं अच्छा,
दुखियों की बेबसी पर, मूँदे रखना आँख नहीं अच्छा।
धन-दौलत की तराजू में, इंसानियत न तौली जाती,
पत्थर बन इस दुनिया में, पाना सम्मान नहीं अच्छा।
यदि औरों का दुख-दर्द तुम्हें, तनिक नहीं रुलाता है,
किसी गरीब का रोना भी, गर तुम्हें नहीं तड़पाता है।
तो मत करना दावा जग में, कि तुम कोई इंसान हो,
दया-धरम से शून्य हो तुम, बस पत्थर के समान हो।
जो औरों के अंधियारे में, आशा की ज्योति जलाए,
सच्चे अर्थों में धरती पर, बस वही मनुष्य कहलाए।
कलमकार