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काव्य कुंज

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विधा तारीख

जीवंत कथाकार

कलम का सिपाही, वो उपन्यासों के सम्राट, जिनकी लेखनी में धड़कते हैं जन-जन के जज़्बात। भारत की माटी की महक, वो गाँव की चौपाल, प्रेमचंद के अक्षरों ने बुना यथार्थ का जाल। हामिद का वो लोहे का चिमटा, आज भी आँखें भिगोता है, कर्ज़ के भारी बोझ तले, होरी आज भी रोता है। 'पूस की वो सर्द रात' और खेत में हल्कू की ठिठुरन, शब्दों में जीवंत कर दिया, जिसने ग़रीबी का चित्रण। 'पंच परमेश्वर' में गढ़ा जिसने, सच्चे न्याय का विधान, 'कफ़न' में उघाड़ा इंसानियत और भूख का अज्ञान। सामाजिक रूढ़ियों पर जिसने किया था कड़ा प्रहार, दलित, शोषित, और किसान का जो बना पहरेदार। राजा-रानी के किस्सों से, साहित्य को ला बाहर, कड़वे सत्य से इस जग को, कराया सरोकार 'नवाब राय' से 'प्रेमचंद' तक का वो बेमिसाल सफ़र, हर कहानी में छोड़ा जिसने, ज़िन्दगी का गहरा असर। पढ़कर कहानियाँ जिनकी, हमने यथार्थ को है जाना, शब्दों से जिसने बुना था, ज़िन्दगी का ताना-बाना। जब तक भारत की ज़मीं है, जब तक है ये आसमान, अमर है वो कथाकार, जिसकी जगत में है अमिट पहचान।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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