Logo

काव्य कुंज

A+
A-
🌙
विधा तारीख

औसत विद्यार्थी होना

न मैं विख्यात रहा कभी, न हुआ कभी कुख्यात, मैं वो पन्ना था जिसे, पलट दिया हर हाथ। एक शोर था आगे वाली बेंचों की मेधा का, एक खौफ था पीछे वाली बेंचों की बाधा का, मैं बीच की उस बेंच पर, बस एक उपस्थिति था, न कोई प्रशंसा मिली, न मैं कभी आरोपित था। शिक्षक की नज़रों को भी, दो ही छोर भाते थे, या तो मेधावी चेहरे, या जो बहुत सताते थे। मेरा नाम हाजिरी के वक्त ही बस आता था, बाकी वक्त तो कमरा भी मुझे कहाँ ढूंढता था? न मेडल की चमक मिली, न सज़ा की सुर्खियां, औसत होने की बस, झेलता रहा मैं खामोशियाँ। पर अब समझ आता है, ओझल होना था वरदान, दबाव की भीड़ में, मैं खुद में ही था एक आसमान। न विख्यात होने का बोझ, न बदनाम होने का डर, मैं मध्यम मार्ग का राही, था अपनी ही धुन में बेख़बर। वो औसत होना ही शायद, मेरी असली पहचान बना, न भीड़ का हिस्सा हुआ, न किसी की कहानी बना।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

✨ Editor's Choice