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चौपट राजा
रचनाकार की आवाज में:
जब कोई चौपट राजा होता है,
ढोल की जगह ढोंग बजता,
अन्याय सोने की सीढ़ी चढ़ता,
न्याय हर मोड़ ठोकरें खाता
दरबारों में आडम्बर गूंजता,
सच का स्वर कंठ में काँपता है—
कागज़ के खेतों में फ़सलें लहलह,
थाली में भूख ही थिरकता है।
कानून की आँख पर पट्टी बंधी है,
तभी तो अन्याय का पड़ला भारी है—
जिन हाथों को हक़ मिलना था,
उन्हीं हाथों में हथकड़ी डाली है।
जो बोलें सत्य, वही झूठे कहलाते
जो हैं बेशर्म वे सहज झूठ बोल जाते—
निरक्षर जनता गुणगान करते न थकते
पर ये न समझ पाते हैं,
लोकतंत्र का क्षय हो रहा
पूंजीवादी सर उठा रहा
भय, भूख और भ्रष्टाचार के आड़ में
जो देश खोखला कर रहा
न्याय जल अन्याय फल रहा
पर राख तले जो चिंगारी है,
वह नाम न्याय का लेती है—
थरथराते पाँवों से भी,
कांटों पर राह बनाती है।
जन मन में जब बीज समझ की फूटेंगे
एक-एक कर दर्पण टूटेंगे,
सच की परतें खुलनी है—
एक नया सबेरा होनी है।
जब कोई चौपट राजा होता है,
इतिहास कलम उठाता है—
न्याय, जो ठोकर खाकर भी,
अंतिम विजय सुनिश्चित पाता है।
कलमकार