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काव्य कुंज

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विधा तारीख

स्वाभिमान की उड़ान

जो चाहे तुम्हें झुकाना, उस पर क्रोध न करना, गिरते हुए मनोबल को, तुम शांत हो संभालना। जिसके मन में मैल भरा, जो नीचा तुम्हें दिखाता है, तरस खाओ उस राही पर, जो ही खुद को जलाता है। वह खींच रहा है पैर तुम्हारे, क्योंकि तुमसे पीछे है, मंजिल तुम्हारी ऊँची है, वह खड़ा अभी भी नीचे है। सूरज को जो पत्थर मारे , वापस उसी पर गिरता है, नफरत की संकरी गलियों में, दम उसी का घुटता है। मुस्कुराकर बढ़ो आगे, शिखर में तुम्हारा वास हो, ईर्ष्या में गर जकड़ गए, फिर स्वयं ही उसका दास हो। जो गिराने की जिद में है, वो पाताल को टटोल रहा, तुम गगन के पंछी हो, तुममें स्वाभिमान है फूल रहा।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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