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कल्याण का ढिंढोरा
रचनाकार की आवाज में:
वाह रे विकास!
तेरा भी क्या गज़ब का पैमाना है,
स्मार्ट सिटी की चमक के लिए,
गरीबों को ही तो मिटाना है।
कल तक जो पक्के मकान,
'योजनाओं' की शान हुआ करते थे,
आज रातों-रात वो
'अतिक्रमण' के मलबे में तब्दील हो गए।
सरकारी बिजली, सरकारी पानी,
और प्रधानमंत्री के नाम की ईंटें,
बुलडोजर ने जब इन्हें रौंदा,
तो व्यवस्था ने ही खुद पर उछाली छींटें।
दशकों का बसेरा चंद घंटों में,
खाकी के खौफ से साफ हो गया,
ग्राम सभा और पंचायत का अधिकार,
जाने कौन सी किताब में राख हो गया!
पुनर्वास के नाम पर मिला है उन्हें,
आसमान का एक शानदार कोना,
बिना लिफ्ट की चौथी मंजिल,
और रोज सीढ़ियों पर हांफ कर रोना।
बुजुर्ग, लाचार और दिव्यांग भी अब,
विकास के इस ऊंचे शिखर पर चढ़ेंगे,
इस भयंकर तपिश में, वो 'नवा रायपुर' के सुनहरे सपने गढ़ेंगे।
कागजों पर फाइलें दुरुस्त हैं, और सब कुछ एकदम चकाचक है,
सत्ता के इस क्रूर खेल में, बस गरीब ही मोहरा और गरीब ही बंधक है।
आज की इस राजनीति में, यह कैसा सुशासन का मॉडल आया है?
जहां आशियाने उजाड़कर, 'कल्याण' का ढिंढोरा पीटा जाया है।
कलमकार