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काव्य कुंज

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विधा तारीख

तुच्छता की परिभाषा

जिनके दरबार में बस "जी हुज़ूर" का तराना है, उन्हें लगता है कि उनकी मुट्ठी में सारा ज़माना है। दिन को अगर रात कह दो, तो वो भी मान लेते हैं, चाटुकारों के हर झूठ को वो वरदान मान लेते हैं। पर भूल से भी कोई गर सच का आईना दिखा दे, उनकी गलतियों की एक छोटी सी लकीर बता दे। तो तन-बदन में आग, आँखों में खून उतर आता है, अहंकार से भरा गुब्बारा फौरन बौखलाता है। आलोचक के शब्द इन्हें तीखे बाण से लगते हैं, कड़वी दवा पीते ही जैसे इनके प्राण निकलते हैं। चाटुकारों की हवा से जो सदा ही फूल जाया करते सच की एक छोटी सी सुई से इनके होंठ सिल जाते इनकी दरबार में जो जितना बड़ा रीढ़-विहीन है, वही इनका सबसे प्रिय और सबसे बेहतरीन है। पर सत्ता ढलते ही ये चमचे भी खिसक जाएंगे और ऐसे "महानुभाव" अपनी किस्मत पर रोयेंगे जो चाटुकारों की झूठी स्तुति से गदगद हो जाते हैं, और निंदक की एक भी खरी बात सह नहीं पाते हैं। लिख कर रख लो, वही मूर्खता की पराकाष्ठा है, यह किसी सिकंदर की नहीं, एक बौने की गाथा है। जहाँ सच को सूली और झूठ को मिलती आशा है, वह महानता नहीं... बस तुच्छता की परिभाषा है!

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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