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तुकाराम मुंडे: सिंघम
रचनाकार की आवाज में:
मिलावट का दौर , बिकने लगा ज़हर बाज़ार में,
हर थाली में बीमारी, और खामोशी थी दरबार में।
तब प्रशासनिक गलियारे से, एक नाम गूंजकर आता है,
जो पच्चीस तबादले सहकर भी, अपना धर्म निभाता है।
ना करोड़ों का लालच डिगा सका, ना रसूखदारों की परवाह उसे,
कानून और न्याय की राह पे चलना, उसकी एक ही चाह उसे।
हाईकोर्ट की कैंटीन हो या, अमीरों का सबसे बड़ा क्लब,
इस अफसर की निडर दस्तक से, सहम गए हैं झूठे सब।
दूध में कैमिकल मिला रहे, जो परोस रहे थे गंदा खाना,
उन्हें लगा था पैसों के दम पर, आसान है इसे डरा पाना।
पर यह वो मिट्टी है जिसने, सूखे और संघर्षों से लड़ना सीखा है,
जिसने हर मुश्किल में, बस सच्चाई का तप सींचा है।
वह कहता है ऐ आम आदमी, तू खुद अपना अधिकार समझ,
बंद कर आँखें मूँद के खाना, अपने निवाले का सार समझ।
तुकाराम मुंडे एक नाम नहीं, आज एक धधकती मशाल है,
ईमानदारी और साहस की, यह देश की बहुत बड़ी मिसाल है।
कलमकार