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विरह वेदना
रचनाकार की आवाज में:
हर गई है शाम कहीं, और याद तेरी गहराती है,
जैसे बुझते दीप की लौ, फिर-फिर कर लौह दिखाती है।
वो तेरा हँसना, वो रूठना, वो बात-बात पर मुस्काना,
अब मन के सूने आँगन में, बस गूँज बन कर आती है।
कलमकार