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काव्य कुंज

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विधा तारीख

विरह वेदना

हर गई है शाम कहीं, और याद तेरी गहराती है, जैसे बुझते दीप की लौ, फिर-फिर कर लौह दिखाती है। वो तेरा हँसना, वो रूठना, वो बात-बात पर मुस्काना, अब मन के सूने आँगन में, बस गूँज बन कर आती है।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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