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ईश्वर तक का मार्ग
रचनाकार की आवाज में:
यदि सचमुच कोई ईश्वर है,
तो वह मंदिर की सीढ़ियाँ नहीं गिनेगा,
न यह पूछेगा कितनी बार माथा झुकाया,
कितनी माला फेरी, कितने घंटे आरती में बिताए।
वह शायद केवल इतना पूछेगा—
जब तुम्हारे सामने किसी की आँखों में आँसू थे,
तब तुम्हारे हाथ प्रार्थना में जुड़े थे,
या सहायता के लिए बढ़े थे?
जब भूख ने किसी का धैर्य तोड़ा,
क्या तुमने शास्त्र सुनाए,
या रोटी का एक टुकड़ा दिया?
जब अन्याय ने किसी की आवाज़ दबाई,
क्या तुम मौन रहे या सत्य के पक्ष में खड़े हुए?
ईश्वर यदि न्यायप्रिय है,
तो उसे चापलूसी की आवश्यकता नहीं।
सूर्य अपनी प्रशंसा सुनकर नहीं चमकता,
नदी स्तुति से नहीं बहती, वृक्ष वंदना से नहीं फलते
वे अपना धर्म निभाते हैं, मनुष्य का धर्म भी कर्तव्य है ।
भक्ति का सबसे ऊँचा स्वर घंटियों की गूँज में नहीं,
एक करुण हृदय की धड़कन में है।
सबसे बड़ा यज्ञ अग्नि में घी डालना नहीं,
अपने स्वार्थ को त्यागना है।
यदि पूजा के बाद भी तुम्हारा व्यवहार कठोर है,
तो तुम्हारी आरती का प्रकाश सिर्फ दीपक तक सीमित है।
पर यदि बिना किसी दिखावे के
तुमने किसी गिरे हुए को उठाया,
किसी निराश मन में आशा जगाई,
किसी पीड़ित का दुःख बाँटा,
तो समझो तुमने वही प्रार्थना की
जो शब्दों से कभी नहीं कही जा सकती।
धर्म का सार किताबों में नहीं,
चरित्र में लिखा जाता है।
और यदि अंतिम क्षण में
ईश्वर सचमुच सामने मिला,
तो शायद वह यह नहीं पूछेगा—
"तुमने मेरे नाम का कितना जप किया?"
वह मुस्कुराकर केवल इतना पूछेगा—
"मेरी बनाई हुई इस दुनिया में,
मेरे बनाए हुए इंसानों के लिए
तुमने क्या किया?"
क्योंकि ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सीधा मार्ग,
उसके बनाए सृष्टि की सेवा से होकर जाता है।
कलमकार