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प्रकृति का प्रतिशोध
रचनाकार की आवाज में:
पत्थरों के इस नगर में, घुट रहा है अब जीवन,
मनुष्य की इस प्रगति ने, नष्ट कर दिया उपवन।
स्वार्थ के ऊँचे शिखर पर, हम बैठकर क्या पाएंगे?
जड़ें अपनी काटकर हम, भला कैसे बच पाएंगे?
सूर्य की तीखी किरण अब, आग सी चुभने लगी है,
प्यासी धरती की देह भी, ताप से जलने लगी है।
ऋतुओं का वह मधुर संगम, आज जैसे खो गया है,
कोमल सा वसंत भी अब, कितना तीक्ष्ण हो गया है।
धरती का गर्भ चीरकर, हम लूटते हैं संपदा,
उद्योगों के धुएं ने, ला दी है कैसी आपदा।
भट्ठियों के विष से अब, दूषित हुआ है यह गगन,
यंत्रों के कोलाहल में, सिसक रहा है आज वन।
जिन वनों में गूँजती थी, पक्षियों की मीठी बोली,
छीन ली हमने वहाँ से, मूक जीवों की वह टोली।
वन्यजीव अब घट रहे हैं, मौन हो रहा जंगल,
इस भयानक चुप्पी में, पनप रहा है अमंगल।
नदियाँ सारी सूख रही हैं, पिघल रहा है हिमालय,
मानव के इस अंध-स्वार्थ से, निश्चित है महाप्रलय।
प्रकृति का जब बांध टूटेगा, मचेगा हाहाकार,
तेरे इस झूठे विकास पर, भारी पड़ेगा यह प्रहार।
कलमकार