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काव्य कुंज

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विधा तारीख

सत्ता का दंभ और करुणा का वसंत

शहीदों के स्वप्न का, वो आज़ाद सवेरा कहाँ गया? रक्षक के वेश में भक्षक, यह कैसा अँधेरा आ गया? लोकतंत्र की पावन वेदी पर, सत्ता का यह कैसा दंभ है, देश की रक्षा क्या अब, इन बर्बर हाथों के संग है? सड़क पर भूखे-प्यासे खड़े, वो मासूम जो हक़ माँग रहे, बधिर व्यवस्था के आगे, अपनी टूटती साँसें बाँध रहे। जो आँखें रही थीं अब तक शुष्क, जड़ और पाषाण सी, आज छलक पड़ीं वो भी, देख यह पीड़ा श्मशान सी। पर इसी घने अंधकार में, संवेदना का एक दीप जला, जब मीलों दूर से उन बच्चों की ख़ातिर, प्रेम का निवाला चला। सत्ता भले हो संवेदनहीन, पर मानवता अभी मृत नहीं, इन निस्वार्थ हाथों से बड़ा, दुनिया में कोई अमृत नहीं। सुशासन की पोथियों को, आज सड़क पर फटते देखा है, एक ओर क्रूरता, दूसरी ओर करुणा की बनती रेखा है। जब तक दिलों में ज़िंदा है यह दर्द, इंसानियत न हारेगी, यह आम आदमी की संवेदना ही, इस मुर्दा तंत्र को तारेगी।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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