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काव्य कुंज

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विधा तारीख

कर्म और नियति

न भाल की रेखाओं में, न तारों की चालों में, मत ढूंढ़ नियति का मर्म कभी, किस्मत के इन जालों में। जो लिखा है वही होगा, यह सबसे बड़ा छलावा है, सच पूछो तो यह 'भाग्य' शब्द, बस कायर का पहनावा है। पुरुषार्थ जहाँ जग जाता है, पथ स्वयं वहाँ बन जाता है, जो तपा दे ख़ुद को भट्टी में, वो कुंदन बन कर आता है। तू स्वयं मूर्तिकार है अपना, तू ही अपना निर्माता है, इस कर्म-भूमि के प्रांगण में, नर कर्मों से फल पाता है। बोगे जो बीज प्रयत्नों के, तो सिद्धि-सुमन खिल जाएंगे, रख हाथ पे हाथ जो बैठ गए, वो खाली हाथ रह जाएंगे। प्रारब्ध नहीं तय करता है, तेरी नौका का तीर कहाँ, पतवार चलाने वालों ने, अक्सर हैं बदले नीर यहाँ। मत मान कि तू कठपुतली है, जिसे कोई और नचाता है, तेरा हर एक कदम ही तेरा, कल का चित्र बनाता है। तू मौन तोड़, तू भ्रम को छोड़, निज भुजाओं पर कर विश्वास, हो पक्का इरादा सीने में, तो मुट्ठी में ही है आकाश। इतिहास उन्हीं का बनता है, जो कर्म-पथ पर चलते हैं, तय होता है सौभाग्य वहीं, जहाँ श्रम के दीपक जलते हैं। इसलिए कर्म को धर्म मान, तू रच दे नई कहानी को, दिखला दे इस संसार को तू, पुरुषार्थ की अमिट निशानी को!

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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