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क्रांति का सूर्य: बाबासाहेब
रचनाकार की आवाज में:
वो मरुस्थल में बहती एक अविरल धारा थे,
वो डूबती मानवता का इकलौता किनारा थे।
जहाँ सदियों से छाया था अंधकार अन्याय का,
वहाँ ज्ञान की मशाल लेकर चमके वो सितारा थे।
तिरस्कार की भट्टी में खुद को तपाया उसने,
शिक्षा को ही अपना हथियार बनाया उसने।
न झुके वो कभी, न रुके वो कभी राहों में,
हर अपमान को सम्मान में बदलना सिखाया उसने।
चुप थे जो होंठ, उन्हें वाणी मिल गई,
मुरझाए चेहरों को नई जवानी मिल गई।
'शिक्षित बनो, संगठित रहो' का जो मंत्र दिया,
हर कमज़ोर हाथ को उसकी कहानी मिल गई।
कलम की ताकत से जिसने विधान लिख डाला,
देश के माथे पर नया अभिमान लिख डाला।
जात-पात के बंधनों को जड़ से तोड़कर,
हर भारतीय के लिए समान आसमान लिख डाला।
"तूफ़ानों से लड़ने का हौसला दे गए वो,
हमें सर उठाकर जीने का सलीका दे गए वो।"
कमज़ोरों को ताकत की एक नई पहचान दे गए,
भारत के संविधान में वो अपना पूरा जहान दे गए।
कलमकार