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काव्य कुंज

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विधा तारीख

बिन करूणा और न्याय के राम नाम अधूरा है

राम नाम की लूट मची है, कैसा कलयुग आया है? मन के भीतर राम नहीं, केवल बाहर नाम सजाया है। जिस माटी में करुणा बहती थी, वहाँ व्यापार बड़ा है, चंदा चोरी करने वाला, देखो सबसे आगे खड़ा है। भक्तों की श्रद्धा को छलकर, तिजोरियाँ जो भरते हैं, धर्म के ढोंगी ठेकेदार ही, सच का सौदा करते हैं। पवित्र धन पर डाका डालकर, अट्टहास वो करते हैं, सच की हर आवाज़ दबाने, भरसक कोशिश करते हैं। प्राचीनता की नींव हिलाकर, भव्य महल वे तान रहे, विकास के शोर में देखो, देवालय की बलि माँग रहे। मंदिर के विग्रह रोते हैं, संस्कृति की माटी छूट रही, पर अधर्म की ऊँची दीवारें, अब भी क्यों न टूट रहीं? बूचड़खानों की चिमनियों से, अब भी धुआँ उठता है, कानूनों की ओट में देखो, उनका धंधा फलता है। जीवों की चित्कार जहाँ है, वह बाज़ार सुरक्षित है, और आस्था का सच्चा प्रहरी, ठोकर खाकर व्यथित है। ईश्वर के दरबारों में भी, धन का पहरा बैठ गया, लंबी-लंबी कतारों में, निर्धन का धीरज टूट रहा। जो नोटों की गड्डी लाया, उसको शीघ्र दर्शन हैं, जो भूखा-प्यासा खड़ा रहा, उसके व्यर्थ समर्पण हैं। त्याग-तपस्या से ओझल हो, चमके कॉर्पोरेट बाबा, कैमरों के आगे आँसू हैं, पीछे लूट का है धावा। धर्म जहाँ वैराग्य सिखाता, वहाँ टर्नओवर की माया है, परमात्मा को भी इन सबने, विज्ञापन में उलझाया है। गंगा मैली, यमुना काली, रोती सदियों की अविरलता, आचमन के जल में बहती, फैक्ट्रियों की विफलता। माँ कहकर जो पूज रहे थे, उन्होंने विष बरसाया है, नारों की ऊँची गूँज में, नदियों का अस्तित्व मिटाया है। गौमाता की रक्षा के हित, भाषण रोज़ बदलते हैं, पूज्यनीय कहकर जो केवल आदर का भाव दिखाते हैं गौशाला का चारा खाकर अपनी तिजोरियां भरते हैं पर सड़कों पर वे आज भी, प्लास्टिक खाकर पलते हैं। मंदिर तो भव्य बना, पर मन का मंदिर सूना है, जब तक भीतर द्वेष रहेगा, यह शोर-शराबा दूना है। इंसान यहाँ इंसान से कटकर, पत्थर को पूज रहा, दिखावे की इस अंधी गली में, क्या सतपथ सूझ रहा? राम नाम की लूट मची है, अब तो आँखें खोलो, सियासत के गंदे खेल पर, कुछ कड़वी बातें बोलो। जब तक मन में दया न जागे, हर अनुष्ठान अधूरा है, बिन करुणा और न्याय के, राम का नाम अधूरा है।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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