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सत्ता और पूँजी का गठजोड़
रचनाकार की आवाज में:
तुम किस आशा में बैठे हो, नीति कभी कोई उपकार करेगी?
तुम्हारी दैन्य-निशा में भी, रश्मि कोई संचार करेगी?
जिसने बुनी ये राजनीति, वो सूत्रधार कोई और ही है,
तुम्हारे मत की शक्ति भी, अब किसी और की धरोहर ही है।
ये लोकतंत्र का जो मुखौटा, एक औपचारिकता शेष है,
यथार्थ तो ये है कि अब, पूर्णतः किसी और का परिवेश है।
ये जो तुम चुन के लाते हो, महज कठपुतलियाँ-मात्र हैं,
अहंकारी पूँजीपति के, ये शासन-नियंत्रित पात्र हैं।
समग्र राष्ट्र जो झोली में, अर्पण बहुत पहले हो चुका,
तुम क्या ढूँढते हो यहाँ, वो व्यवस्था है सो चुका?
महंगाई के इस प्रहार में, तुम निरंतर पिसते जाओगे,
बेरोजगारी के अतल गर्त में, तुम स्वयं को ही पाओगे।
तुम तो केवल 'ईंधन' हो, इस विकास के रथ-चक्र के,
विवशताएँ तुम्हारी ही होंगी, आज रखलो लिख के।
वह रसूखदार हैं मठाधीश, उन्हें कानून भी न छूता,
तुम्हारी ही बस्ती का, हर एक तिनका है टूटता।
आशा का कोई भी दीपक, यहाँ तुम कदापि न जलाना,
ये खेल उनकी शर्तों पर है, ये सत्य तुम अब अपनाना।
तुम्हें तो सिर्फ जीना है, अभावों के ही साये में,
तुम्हारी बेहाली का विवरण, उनके मुनाफ़े के बही-खाते में।
कलमकार