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जिंदगी सब सिखा देती है
रचनाकार की आवाज में:
किताबों के पन्नों में कहाँ दर्ज था सलीका जीने का,
ये तो वक्त ही है, जो चेहरा चमकाना सिखा देती है।
कभी तपती धूप, तो कभी सर्द रातों का साया,
बेरहम धूप ही तो छाँव की कीमत सिखा देती है।
जिंदगी सब सिखा देती है.....
शुरु में लगता है कि हर मोड़ पर कोई हाथ थामेगा,
पर तन्हाई अक्सर खुद का साथ निभाना सिखा देती है।
जिन्हें गुमान था अपनी उड़ान पर बहुत ज्यादा,
उन्हें ये जमीन, फिर से सर झुकाना सिखा देती है।
जिंदगी सब सिखा देती है.....
जब टूटते हैं वो ख्वाब जिन्हें पलकों ने सजाया था,
तो टूटी हुई किरचियों से घर सजाना सिखा देती है।
खोकर ही समझ आता है कि पाने का अर्थ क्या था,
खाली हाथ, पूरी दुनिया को मुट्ठी में लाना सिखा देती है।
जिंदगी सब सिखा देती है.....
कभी लहजे की कड़वाहट, तो कभी खामोश सिसकियाँ,
हृदय के घावों पर खुद ही मरहम लगाना सिखा देती है।
मोहब्बत में मिले धोखे हों या अपनों की बेरुखी,
ये खुदगर्ज दुनिया, खुद से प्यार करना सिखा देती है।
जिंदगी सब सिखा देती है.....
न हारना बुरा है, न गिरना कोई पाप है यहाँ,
ये गिर कर फिर से उठना और संभलना सिखा देती है।
मत पूछ कि 'क्या सीखा' तूने इस सफर में ऐ दोस्त,
ये मौत से पहले, खुल कर जीना सिखा देती है।
जिंदगी सब सिखा देती है....
कलमकार