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स्वार्थ का बीज
रचनाकार की आवाज में:
छोटी सी एक इच्छा जब, सीमाओं को पार करती है,
दबी सी कोई लालसा जब, नया लालच उभारती है।
यहीं बोया जाता है वह बीज, एक बड़े विनाश का,
जो कल एक विकट अन्याय का कारण बनती है।
छिनता है अधिकार किसी का, पहले बस निवाले भर,
फिर लोभ मचल उठता है, औरों के सुखद घरोंदे पर।
'केवल मेरा भला हो', सोच जब यह घर बनाती है,
तो मानवता अपनी ही, अंतर्मन का गला दबाती है।
पलट इतिहास के पन्ने, कभी तुम ध्यान से देखो,
कि स्वार्थ की क्षीण धारा, कैसे सागर में बदलती है।
सुई की नोक भर भूमि की, कौरवों की वो हठ,
अचानक ही न महाभारत के, महा-समर में ढलती है।
कुछ रुपयों की महक जब, न्याय को ही तौलती है,
कपट की एक भावना भी, झूठ के द्वार खोलती है।
दबी सी एक चिंगारी, जिसे हम तुच्छ कहते हैं,
वही भड़क कर एक दिन, पूरे वन को निगलती है।
अचानक रातों-रात कोई, अत्याचारी नहीं बनता,
बिना गहरी सी नींव के, कोई भी भवन नहीं तनता।
जो दूजे के छलकते आँसुओं को, अनदेखा करता है,
वही छोटा सा स्वार्थ कल, बस्तियाँ उजाड़ देता है।
कलम के एक साधक का, यह विचार याद रहे,
हृदय में करुणा और नेह का, सदा ही आधार रहे।
कि हर एक महा-अन्याय, जो सदियों तक रुलाता है,
किसी के छोटे से स्वार्थ से ही, हमेशा जन्म पाता है।
कलमकार