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काव्य कुंज

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विधा तारीख

विजय और यथार्थ

खेल में तो विश्व-विजेता, सत्य लेकिन देखिए, जीवन के इस क्षेत्र में, अपनी विवशता तौलिए। वे सुशासन के शिखर पर, हम व्यवस्था से हैं त्रस्त, वे यथार्थ में जी रहे, हम खोखले नारों में हैं मस्त। स्वच्छ वायु, श्रेष्ठ चिकित्सा, और उत्तम है पढ़ाई वहाँ, पन्नों में सिमटी है विकास, भ्रष्ट है पूरी व्यवस्था यहाँ। उनका जीवन-स्तर छूना, क्या मात्र एक स्वप्न है? जीत कर भी हारते हम, यह निरंतर प्रश्न है। तालियों की गूँज से, क्या झोपड़ी उज्ज्वल बनेगी? मात्र कप ले आने से, क्या दरिद्रता यूँ ही मिटेगी? सार्थक होगी विजय अपनी, जब सुधरेंगे ये हालाद, जब राष्ट्र का हर नागरिक, चैन से सोएगा हर रात।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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