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चंदा, धंधा और सिस्टम का फंदा
रचनाकार की आवाज में:
सिस्टम को ही राखी बाँधी, खूब निभाया 'रक्षा-बंधन',
आज व्यवस्था के मंचों पर, बस ऐसों का होता अभिनंदन!
'चंदे' का यह अजब धंधा है, 'बॉन्ड' में सब कुछ छिप जाता,
'दे दो चंदा, ले लो धंधा', यह फॉर्मूला हिट बन जाता ।
खातों में जो एनपीए है, वह तो महज आँकड़ा है,
गरीब की किश्त जो एक भी चूके, बैंक का चाबुक तगड़ा है।
अरबों का कर्ज डकारे जो, वो बाइज्जत बरी हो जाते,
छोटे रकमों में सेटलमेंट कर, फिर से सफ़ेद पोश कहलाते।
लोन चुकाने के इस 'हेयरकट' में, बैंकों का ही मुंडन होता,
आम आदमी टैक्स चुका कर, बैठ किनारे पर ही रोता ।
कई नाम हैं 'सुभाष' सरीखे, जो लूपहोल का लाभ उठाते,
फिर वही ज्ञानचंद बन टीवी से, हम सबको राह दिखाते।
वाह रे व्यवस्था! तेरी भी क्या गज़ब मजबूरी है,
अमीरों की लूट है जायज़, और गरीबों की कुर्की ज़रूरी है!
कलमकार