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युवाओं का सुनहरा भविष्य – फाइलों में सुरक्षित
रचनाकार की आवाज में:
देश में इस समय सबसे सुरक्षित चीज़ अगर कोई है, तो वह है युवाओं का भविष्य—क्योंकि वह कहीं बाहर नहीं, सरकारी फाइलों और प्रेस कॉन्फ़्रेंस के शब्दों में बंद है।
सरकार बड़े आत्मविश्वास से बताती है कि बेरोजगारी कम हो रही है। कैसे? यह एक गूढ़ रहस्य है, जिसे समझने के लिए आपको गणित नहीं, सांख्यिकीय छल की कला आनी चाहिए। बेरोजगार को “स्व-रोजगार” कह दीजिए, ठेले को “स्टार्टअप” और चुप्पी को “संतोष”—फिर देखिए, आंकड़े कैसे मुस्कुराने लगते हैं।
युवाओं के जले पर यह वही मरहम है, जिसमें नमक का अनुपात थोड़ा ज्यादा है।
दूसरी ओर, हमारे युवा बड़े धैर्यवान हैं। वे भर्ती का इंतजार करते हैं—सालों-साल। परीक्षा का नोटिफिकेशन आता है, फिर टलता है, फिर बदलता है, और अंत में या तो अदालत पहुंचता है या इतिहास बन जाता है।
रिजल्ट आने की प्रक्रिया इतनी रहस्यमयी है कि वैज्ञानिक भी अब ब्लैक होल छोड़कर इसकी स्टडी करना चाहते हैं।
सरकार इसे “प्रक्रियात्मक जटिलता” कहती है, युवा इसे “जीवन का स्थगन”।
और फिर आती है शिक्षा—जिसे कभी ज्ञान का मंदिर कहा जाता था। अब यह एक सुव्यवस्थित शिक्षा का व्यापार है।
यहाँ डिग्रियाँ पैकेज में मिलती हैं और सपने ईएमआई पर।
कौशल कम, फीस ज्यादा; ज्ञान कम, ब्रांडिंग ज्यादा।
जब शिक्षा मुनाफे का सौदा बन जाए और रोजगार “जुगाड़” का, तो सुशासन शब्द खुद ही शब्दकोश से इस्तीफा दे देता है।
सरकार के पास हर सवाल का जवाब है—बस समाधान नहीं।
युवा पूछता है, “नौकरी कब?”
सरकार कहती है, “आंकड़े देखिए।”
युवा कहता है, “परीक्षा कब?”
सरकार कहती है, “प्रक्रिया चल रही है।”
युवा कहता है, “भविष्य?”
सरकार मुस्कुरा कर कहती है, “उज्ज्वल है”—और यह उजाला शायद सिर्फ विज्ञापनों में दिखता है।
विडंबना यह है कि जिस देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा जनसंख्या है, वही आज सबसे बड़ी उपेक्षा का शिकार है।
ऊर्जा है, क्षमता है, आकांक्षा है—बस दिशा देने वाली नीयत फाइलों में अटकी है।
अंततः, यह व्यंग्य नहीं, दस्तावेज़ है—उस दौर का, जहाँ युवा अपने सपनों का नहीं, तारीखों का इंतजार करता है।
और सरकार?
वह अब भी आंकड़ों के आईने में खुद को सबसे सुंदर देख रही है।
कलमकार