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सेहत भगवान भरोसे
रचनाकार की आवाज में:
बजाइए तालियां, 'खाद्य सुरक्षा' का त्यौहार है,
संभलकर निगलना साहब, थाली में जहर तैयार है।
विदेशों ने लौटा दिया, हमारा मसाला, फल और अन्न,
कहा- "इसमें घुला है, कीटनाशकों का अंधापन।"
गजब की यह व्यवस्था और गजब का यह तंत्र है,
बिना जांचे 'क्वालिटी पास' का, यहाँ सिद्ध मंत्र है।
कुर्सी पर बैठे साहब, बस नोटों का वजन नापते हैं,
गांधी जी के चश्मे से, हर मिलावट को जांचते हैं।
जेबें अगर भर जाएं, तो जहर भी 'अमृत' हो जाता है,
बिना लैबटेस्ट के ही, शत-प्रतिशत शुद्ध' लिखा जाता है।
कंपनियां भी शातिर हैं, दोहरे इनके ढंग हैं,
विदेशों के आगे सरेंडर, अपनों के साथ जंग है।
गोरे बीमार न पड़ें, इसलिए उनके लिए प्योर माल,
और अपनों को परोसते कैंसर कारक जहरीला थाल
ये मुनाफे के अंधे, नोटों की जो अट्टालिका बनाएंगे,
भूल गए कि खुद भी इसी जहर की भेंट चढ़ जाएंगे।
अजब युग है, जहाँ केवल स्वार्थ की जयकार हो रही है,
सच्ची इंसानियत, अब आईसीयू में तड़प रही है।
हर कोई अंधा है, इस कलयुगी नोटों की खनक में,
सस्ती हो गई है जिंदगी, चंद रुपयों की सनक में।
रफ्तार यही रही, तो यह धरती श्मशान बन जाएगी,
मनुष्य जीने लायक न बचेगा, सिर्फ लाशें नजर आएंगी।
तो आइए, मिलकर 'सरकारी मुहर' को नमन करें,
जो बिना जांचे, हर जहर को हमारी थाली में अर्पण करे।
सुरक्षा सिर्फ विज्ञापनों में, सेहत भगवान भरोसे छोड़ दो,
'खाद्य दिवस' अमर रहे, चलो थोड़ा जहर और लिल लो!
कलमकार