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कर्म की कसौटी
रचनाकार की आवाज में:
परिणामों के पैमाने पर, जो कर्म तुले वह श्रेष्ठ नहीं,
स्वार्थ की गंध छिपी, वह धर्म कभी भी ज्येष्ठ नहीं।
गौतम ने जो ज्ञान दिया, उस सत्य को पहचान ज़रा,
फल तृष्णा त्याग मनुज, ध्येय की शुचिता जान ज़रा।
नहीं ज़रूरी सत्पथ पर, हर अंत हमेशा सुखद मिले,
या नेकी के पदचिह्नों पर, राहों में केवल फूल खिलें।
सत्कर्म वही है जीवन में, जिसका भाव मलिन न हो,
ध्येय रहे बस लोकमंगल, निज स्वार्थ कहीं लीन न हो।
हार-जीत, ये फल-निष्फल, सब कालचक्र के फेरे हैं,
हम केवल अपने कर्म और, अपनी नीयत के चेरे हैं।
रख स्वच्छ हृदय दर्पण, जिसमें करुणा का वास रहे,
बुद्ध का यही संदेश अमर, बस शुद्ध भाव ही पास रहे।
कलमकार