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जवाबदेही लापता है!
रचनाकार की आवाज में:
लोकतंत्र के इस सर्कस में, 'जवाबदेही' लापता है,
कुर्सी से चिपके रहने का, सबको हुनर पता है!
नैतिकता की बातें अब बस, रैलियों में सजती हैं,
इस्तीफे के नाम से इनकी, नब्ज उखड़ने लगती है!
शिक्षा के जो हैं 'प्रधान', उनका गजब तमाशा है,
पेपर लीक का सिलेबस, इनकी नई परिभाषा है!
सड़क पे रोता युवा खड़ा, खाकर पुलिस की लाठी,
पर मंत्री जी मुस्कुरा रहे, 'सिस्टम' है इनका साथी।
कुर्सी पर ऐसा फेविकोल है, कैसे उसको छोड़ेंगे?
छात्रों के भविष्य की खातिर, अपना गुल्लक क्यों फोड़ेंगे?
सड़क परिवहन वाले नेता, अब तेल का खेल चला रहे,
गन्ने के मीठे रस से वो, बेटों का भाग्य जगा रहे!
'ग्रीन एनर्जी' का यह नारा, दूर से बड़ा सुहाना है,
पास से देखो तो इसके पीछे, अपनों लाभ पहुंचाना है!
नीतियां देश की बन रही हैं, या परिवार के लाभ की?
हिम्मत है तो माँग के देखो, ऑडिट इस हिसाब की!
गजब का अपना लोकतंत्र है, गजब यह सुशासन है,
जनता की छाती पर चढ़कर, मुस्कुराता प्रशासन है!
जवाबदेही मांगोगे तो, 'देश-विरोधी' कहलाओगे,
चुपचाप अगर जो सहते रहे तो, सच्चे देशभक्त बन जाओगे!
इसलिए ऐ आम आदमी, मूक दर्शक ही बने रहो,
वो भरते रहें तिजोरियाँ,तुम ताली थाली पीटते रहो!
कलमकार