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काव्य कुंज

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विधा तारीख

मुखौटों का बोझ

तुमने जो पहने हैं चेहरे, ये कहाँ के हैं? सब उधार के हैं, दूसरों की पसंद के हैं। एक चेहरा पहनकर दफ्तर जाते हो, दूसरा पहनकर अपनों में मुस्कुराते हो, तीसरा कोई और ही है—भीड़ के लिए, चौथा रखा है—शायद अपनी हार छिपाने के लिए। इतने सारे चेहरों के बोझ तले, तुम्हारी अपनी असली शक्ल दब गई है, तनाव बाहर से नहीं ,ये उस खालीपन से उपजता है, जो हर बार चेहरा बदलते ही, तुम्हारे भीतर गहरा जाता है। जिसे ओढ़ना पड़ता है हर पल 'स्वयं' के विपरीत, वो कैसे हो सकता है कभी भी पूर्णतः विनीत? जिसे डर है कि कहीं उतर न जाए यह नकाब, वह कैसे देख पाएगा कभी नींद में भी कोई ख्वाब? सुकून तो उस पत्थर को भी मयस्सर है, जो अपनी जगह पर स्थिर है, एक ही रूप में, जिसके पास न छिपाने को कुछ है, न दिखाने को जिसे न कुछ छिपाना हो, न कुछ साबित करना, दरअसल वही मोक्ष में खड़ा मिलेगा क्योंकि मोक्ष वही क्षण है, जब मनुष्य अपने सारे मुखौटे उतारकर अपने ही सामने खड़ा हो सकेगा ।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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