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माँ: निस्वार्थ प्रेम की मूरत
रचनाकार की आवाज में:
स्याही खत्म हो जाएगी, पर शब्द कम पड़ जाएंगे,
माँ के त्याग के किस्से, सदियों तक सुनाए जाएंगे।
वह कोई देवी नहीं, बस एक ममता की छाया है,
जिसने अपनी हर सांस को, हम पर लुटाया है।
न उसने कभी थकान कही, न कभी आराम माँगा,
बदले में उसने बस, बच्चों का सौभाग्य माँगा।
उसके हाथों का स्पर्श ही, हर मर्ज की दवा है,
माँ की दुआ ही तो, दुनिया की सबसे शुद्ध हवा है।
कंधे पर सिर रखकर उसके, सारा बोझ उतर जाता है,
अंधेरी राहों में भी, सही रास्ता नजर आता है।
मंदिर के पत्थर पूजने से पहले, घर की चौखट चूम लेना,
जहाँ माँ मुस्कुराती है, वहीं असली स्वर्ग को ढूंढ लेना।
उसका आँचल ही, दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना है,
उसके बिना तो यह सारा संसार ही, जैसे सिर्फ खिलौना है।
सार्थक है वह जीवन, जो माँ की सेवा में बीत जाए,
क्योंकि माँ की मुस्कान से, इंसान हर जंग जीत जाए।
कलमकार