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बिकती शिक्षा, खोखला विकास
रचनाकार की आवाज में:
कंक्रीट के इन जंगलों को, तुम अगर विकास कहते हो,
बुझती हुई उम्मीद में, तुम रौशनी का वास कहते हो।
तो सुनो! यह भ्रम तुम्हारा, आज टूटता दिखाई दे रहा है,
विकास के इस शोर में, भविष्य घुटता दिखाई दे रहा है।
रात-रात भर जागकर, जिस युवा ने आँखें गलाई हैं,
चंद सिक्कों में तुमने, उसकी मेहनत की बोली लगाई है।
पर्चे लीक नहीं होते यहाँ, रिसते हैं अरमानों के घाव,
और शिक्षा के सौदागर, खेल रहे हैं सत्ता का दांव।
सिस्टम की इस सेंधमारी का, आख़िर कौन है ज़िम्मेदार ?
चुप है प्रशासन, मौन है तंत्र, कैसा ये सुशासन का है दरबार ?
जवाबदेही तय करने से, क्यों तुम काँपते हो?
क्यों मेहनत करने वालों के, तुम सरेआम हक़ नापते हो?
जिस देश में शिक्षा की खातिर, निवालों को ठुकराना पड़े,
हक़ माँगने को हमेशा, अनशन पे बैठ जाना पड़े,
लद्दाख की सर्द वादी का, वो तपस्वी इसीलिए तो बैठा है,
इन बिकते हुए पर्चों के खिलाफ़, एक इतिहास लिए बैठा है।
वो माँगता नहीं महल, वो जवाबदेही की चाह रखता है,
वो चाहता है वो कल, जो अँधेरों की राह नहीं तकता है।
जहाँ नीलाम ना हो योग्यता, जहाँ भ्रष्टाचार का दीमक ना हो,
जहाँ युवा के माथे पर, हताशा की कोई शिकन ना हो।
जागो! इससे पहले कि ये तपस्या, बर्फ में विलीन हो जाए,
तुम्हारा ये खोखला विकास, एक दिन ख़ाक में तब्दील हो जाए।
क्योंकि जिस देश में शिक्षा के लिए, भूख हड़ताल होती है,
वहाँ इमारतें चाहे जितनी ऊँची हों, नीवें खोखली होती हैं।
कलमकार