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काव्य कुंज

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विधा तारीख

चाय की मिठास ले उड़े

सस्ता कच्चा तेल छोड़कर, महंगा खेल रचाया है, अमेरिका की घुड़की ने, यह सारा नाच नचाया है! अंकल ड्रम के डर से साहब, घुटनों पर आ बैठे, 'ग्रीन इकॉनमी' कहते-कहते, सारे गन्ने खा बैठे। इथेनॉल बनाना खुद में ही, भारी महंगा सौदा है, अर्थशास्त्र की समझ नहीं, बस झूठा एक हौव्वा है! मूर्ख, एथेनॉल बनाते-बनाते, चीनी महंगी कर बैठे! पेट्रोल के दाम तो अब भी, आसमान पर हैं ऐंठे, वाह रे ज्ञानी! विदेश नीति का, क्या ही बूरा हाल किया? गाड़ी भले ना दौड़ी सस्ती, चाय का स्वाद बिगाड़ दिया!

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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