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काव्य कुंज

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विधा तारीख

यू-टर्नासन

पहले जिसने भरा था दम, बदलेंगे हम देश की काया, अनुलोम से खींची सत्ता, विलोम में पूरा तंत्र समाया। गर्ज रहे थे मंच-मंच पर, सिंह-नाद का रूप धरा था, काले धन पर कपालभाति कर, जन-जन में विश्वास भरा था। दिखलाया था 'वीरभद्रासन', शंखनाद था बड़ा करारा, योगपीठ से निकल पड़ा था, आंदोलन का वो मतवाला। प्राणवायु 'अच्छे दिनों' की, घर-घर तक पहुँचाई जिसने, दिल्ली के सिंहासन पर फिर नई व्यवस्था बैठाई जिसने। मगर समय का चक्र घूमा तो, आसन भी सब बदल गए हैं, ज्वलंत समकालीन मुद्दों पर, बाबा के सुर बदल गए हैं। महंगाई पर जब जनता का, होने लगता है 'शीर्षासन', बाबा धारण कर लेते हैं, तुरंत मौन का 'शवासन'। गेंदें अब 'व्यापारासन' की, कोर्ट में उनके घूम रही हैं, पतंजलि की दिव्य -बूटियाँ, बाज़ार का नभ चूम रही हैं।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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