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काव्य कुंज

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विधा तारीख

बदलाव

वो ठंडी हवा अब कम होने लगी है, दोपहर की धूप अब बढ़ने लगी है। वसंत की विदाई का वक्त आ गया, देखो, गर्मी का नया एक रंग छा गया। फूल अगर झड़ते हैं, तो फल भी तो आएँगे, बिना तपे सूरज से, वो कैसे पक पाएंगे? तर्क कहता है कि धूप बड़ी भारी है, पर सच तो ये है कि ये बढ़ने की तैयारी है। पुरानी यादों को अब ज़रा छोड़ना होगा, नए रास्तों से अब नाता जोड़ना होगा। वक्त का ये पहिया यूँ ही चलता जाएगा, जो बदल गया, वही जीवन को समझ पाएगा। खिड़की खोलो और इस बदलाव को देखो, तर्क छोड़ो और बस जीवन के भाव को देखो। ये मौसम का आना-जाना तो एक बहाना है, हमें तो बस हर हाल में मुस्कुराते जाना है।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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