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काव्य कुंज

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विधा तारीख

जमीर की नीलामी

चले थे बदलने जो राजनीति, खुद ही ढल गए, रंग देख उनके, गिरगिट भी शर्मसार हो गए। जो कभी 'क्रांति' का झंडा लेकर निकले थे, आज उसी पाले में जा बैठे हैं जिसे कल तक कोसते थे। वो आए थे राजनीति को गंगा करने, खुद हाथ धोकर सत्ता के सागर में बह गए। कसमें खाई थीं जनता की आँखों में बसने की, अब कुर्सी की खातिर खुद की नज़रों से गिर गए। फितरत तो लिखी नहीं होती, चेहरे की लकीरों में, अक्सर ईमान बिक जाते हैं, सत्ता की जागीरों में। निकले थे बदलने को, इस मुल्क की तकदीर को, आज वही कैद मिले, सोने-चांदी की जंजीरों में। कल तक जो थे बागी सुर, आज वो राग दरबारी हैं, कुर्सी की खातिर देखो, कैसी ये वफादारी है? चेहरे पर मासूमियत है, पर नीयत में दगाबाजी, ये राजनीति नहीं साहब, बस जमीर की नीलामी है।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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