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काव्य कुंज

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विधा तारीख

बरसा दिन आसीछे

बरसा दिन आसिछे, पायन झर-झर बरसूछे, धरती मां हंसूछे, सागुआ-सागुआ दिखुछे। सबु आड़े सागुआ-सागुआ दिखुछे। छुआमाने खेलुछन, छप-छप करी नाचुछन, किहे भी नेइं सुनबार, मां..जे डाखी मरुछे, केते टे डाखी मरुछे, कलिया बादल घेरुछे, चड़का जे केते मारुछे, गड़-गड़ बजा बागिर बाजुछे, टीके-टीके डर लागुछे। मते टीके डर लागुछे। मन जे उसत हउछे, खेलबार-भिझबार चहुछे बरसा दिन आसिछे, पायन झर-झर बरसूछे ॥ धरती मां.. हंसूछे ।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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