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काव्य कुंज

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विधा तारीख

राख में छिपी अगन

ऋचाओं के सुमधुर स्वरों से, फूटती थीं भोर की किरणें, तपोवन की शांत छाँव में, सुलझती थीं सभी उलझनें। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' केवल किताबी शब्द ना था, वह राष्ट्र, जो संसार के भाल पर एक बिंदी सा था। ज्ञान का अविरल नाद, जब गूँजता था गगन में, सत्य का ही आचरण था, जन-जन के हर मन में। पर आज यह कैसा तिमिर, निज अस्मिता को डस रहा? खंडित हुए हैं मूल्य, और पाखंड हम पर हँस रहा। वेदों की उस पुण्य-भूमि पर, हम स्वार्थ में भटके हुए, अहंकार और क्षुद्रताओं के, भंवर में लटके हुए। आँगन बँटे, भाषा बँटी, नफरत का विष भी घुल गया, जिसने गढ़ा था विश्व को, वह स्वयं को ही भूल गया। पर राख के इस ढेर में, अब भी छिपी है एक अगन, नव-चेतना के सूर्य से, फिर दमक उठेगा यह गगन। हम गढ़ेंगे राष्ट्र ऐसा, जो भौतिकता का दास न हो, जहाँ धर्म का व्यापार या, इंसानियत का ह्रास न हो। जहाँ सत्य के आधार पर, कर्म का प्रासाद हो, हो ज्ञान-विज्ञान उन्नत, और समता का निनाद हो। उठो कि अब संकल्प को, फिर आहुति की प्यास है, यह मातृभूमि जो मौन है, इसे बस तुम्हारी आस है। निज क्षुद्रताओं को जला, तुम चेतना का दीप लो, काल के इस भाल पर, तुम नया इतिहास लिख दो। राष्ट्र-निर्माण का यज्ञ, अब रुक न पाए एक पल, तुम ही तो हो राष्ट्र का, स्वर्णिम अतीत और भव्य कल!

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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